शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

आस-पास बिखरे लोग...

"क्या हुआ?”
"पता नहीं"
"तो फिर आप यहां क्या कर रहे हैं?"
"जो आप कर रहे हैं"

नीली कमीज़ वाले के पूछने पर सफेद कमीज़ वाले ने बेहद रूखा पर मुंहतोड जवाब दिया था। चौराहे पर भीड दोगुनी हो गई थी। लोग अलग-अलग टोलियां बनाये खडे थे। नीली कमीज़ वाले की जिज्ञासा अभी तक शांत नहीं हुई थी,सो वह कभी इस टोली कभी उस टोली में खडा हो, घटना को समझने की कोशिश कर रहा था। और अब जाके ,इतनी देर बाद उसे समझ आया कि सामने वाले घर में बहू जल मरी या मार दी गई।

’अरे साहब!घर के लोगों ने खुद ही जला दिया, और अब नाटक फैला रहे हैंकि बहू खुद ही जल मरी।’’
"ये तो बडी बुरी बात है। यहां इतनी बडी दुर्घटना हो गई और आप सब खडे-खडे तमाशा देख रहे हैं।’ नीली कमीज़ वाला अपनी पेंट ऊपर चढाते हुए बोला।

’हम सब तो तमाशा देख रहे हैं,आप ही कुछ क्यों नहीं करते?’’
"मुझे तो पूरी घटना ही नहीं मालूम थी।’
’अब तो मालूम हो गई? अब कुछ करिये।’
’अरे नहीं साहब, ये विवाद का वक्त नहीं है। इस केस पर विचार करना चाहिये। ’
बात बिगडती देख नीली कमीज़ वाला खिसिया कर फिर अपनी पेंट ऊपर चढाने लगा।
’पहले अपनी पेंट तो सम्भाल लो, फिर केस सम्भालना।’
ज़ोरदार ठहाका हवा में तैर गया। नीली कमीज़ वाला वहां से खिसक गया था।
’यार वो वाली फिल्म देखी उसमें भी सास बहू को बडा दुख देती थी।’
’मैं तो ऐसी रोनी फिल्में देखता ही नहीं। क्या फ़ायदा?’
’और कौंमेडी फ़िल्म्स देखने से फ़ायदा है?’
नीली कमीज़ वाला था। लेकिन उसके सवाल का जवाब देना किसी ने ज़रूरी नहीं समझा।
’ देख यार वो गुलाबी सूट वाली लडकी.....’
’हां यार.......बडी सुन्दर है..... चल॥ उसके पास से निकलते हैं॥’
’जनाब ये तो ठीक बात नहीं...पहली बात तो यहां बहू जला दी गई, दूसरी ये कि आपलोग मामले की गंभीरता को समझने की बजाय लड्की को छेडने का प्लान बना रहे हैं...कोई आपकी बहन को ऐसा ही कहे तो?’

’कौन स्साला मेरी बहन तक पहुंच रहा है? "

लडके ने पलटकर देखा तो नीली कमीज़ वाला अपनी बात कहने के बाद अब उसकी गंभीरता समझ रहा था, दूसरे लडके बीच-बचाव ना करते तो शायद बुरी तरह पिट जाता नीली कमीज़ वाला।
सामने वाले घर से ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ें आने लगीं थीं, पुलिस के दो सिपाही आ रहे थे, शायद इसीलिये। भीड फिर तितर-बितर हो गई थी। लोगबाग सिपाहियों के पीछे-पीछे उस घर की बाउन्ड्री में घुस गये थे। बाकी तमाशबीन घर के बाहर ही भीड लगाके खडे थे। चौरहे पर अब इक्के-दुक्के लोग ही घूम रहे थे।

’बडा बुरा हुआ साहब! और लोगों को तो देखो, कुछ करते ही नहीं।
’अरे श्रीमान जी यदि मैं इस मोहल्ले में रहता होता, तो इन लोगों को बचने न देता। पता नहीं इस मोहल्ले के लोग कैसे डरपोक हैं...कैसे सब देख-सुन रहे हैं, और चुप हैं।’
’लो भला!! देख तो आपके साथ ही रहे हैं। जितना आपको मालूम है, उतना ही हमें भी... घटना कोई सबके सामने तो हुई नहीं॥ कयास हैं केवल....’

’घटना का पता कैसे लगा? मतलब कब हुई...??मुझे तो कुछ खास नहीं मालूम, लेकिन जब शोर उठा उस वक्त मैं यहीं अपने घर के बाहर ही था। सामने वाले घर में तेज़ रेडियो बज रहा था।रोने की आवाज़ें सुनाई दीं, तो उसी घर के छुटके बच्चे से जो बाहर ही था, पूछा तो बोला कि छोटी भाभी जल के मर गईं। कमरे में बंद हैं। मेरे पूछने पर कि कब से बंद हैं, बोला दस-पन्द्रह मिनट से। अब साहब! दस-पन्द्रह मिनट में तो आदमी पूरी तरह जल भी नहीं पायेगा, उन्होंने मरा हुआ कैसे डिक्लेयर कर दिया?’
’अरे वाह!! भई कमाल की जानकारी है आपके पास तो!!!’

बताने वाला घबरा गया था।दोनों सिपाही बाहर आ गये थे, और अब मोहल्ले वालों से पूछताछ कर रहे थे।
’क्यों भैये...तुमने लडकी के रोने-चिल्लाने की आवाज़ें तो सुनीं होंगीं?’
’ऐं.....कहां....मैं तो आज उठा ही बहुत देर से हूं।’
’क्यों भाई साहब, आप तो ऊपर ही रहते हैं, आप ने तो ज़रूर सुनी होंगीं।"
’मैं.........मैंने कहां सुनी........मैं तो अभी-अभी बाहर से लौटा हूं।’
’श्रीमान जी, आप को तो बडी अच्छी जानकारी है, आप ही उन पुलिस वालों को कुछ क्यों नहीं बताते?’
’मैं?? अरे सब सुना-सुनाया है, मैने कुछ देखा थोडे ही है...’

और वे वहां से खिसक गये थे। और अब धीरे-धीरे सारे लोग खिसकने लगे थे। पता नहीं कब कौन पुलिस की चपेट में आ जाये......!!! पुलिस वाले भी खानापूर्ती के लिये ऊट्पटांग बयान दर्ज़ कर वापस चले गये थे। पोस्ट्मार्टम हुआ, रिपोर्ट आत्महत्या सिद्ध कर रही थी। और लोग अपने-अपने घरों में ज़ोर-शोर से कहते नज़र आ रहे थे कि ये हत्या है, लेकिन बाहर किसी के पूछने पर तत्काल अपनी बात से मुकर जाते, पुलिसिया झंझटों से बचने के लिये।और एक महत्वपूर्ण केस दब गया था, उचित जानकारी के अभाव में.....।

बुधवार, 12 अगस्त 2009

इस्मत जैदी की गजल



  • मैं जा रहा हूँ मेरा इंतज़ार मत करना ,
    और अपनी आंखों को भी अश्कबार मत करना ।


  • ग़रीब दोस्त हूँ कर पाउँगा नहीं पूरी ,
    के ख्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना।


  • ये जानता हूँ के तखरीब तेरी आदत है,
    हरे हैं खेत इन्हें रेगज़ार मत करना ।


  • मुझे तो मेरे बुजुर्गों ने ये सिखाया है,
    के दुश्मनों पे भी तुम छुप के वार मत करना।


  • मेरी हलाल की रोज़ी मुझे सुकूँ देगी,
    इनायतों से मुझे ज़ेर बार मत करना।


  • क़दम तुम्हारा सियासत में गर जमे, न जमे,
    ज़मीर अपना मगर दाग़ दार मत करना।


  • जो वालेदैन ने अब तक तुम्हें सिखाया है ,
    अमल करो न करो शर्मसार मत करना ।


  • सड़क भी देंगे वो पानी भी और उजाला भी,
    सुनहरे वादे हैं बस ऐतबार मत करना।


  • जो सच है जान लो फिर कोई फ़ैसला देना
    बिना पे शक की कभी इश्तहार मत करना ।


  • (यह ग़ज़ल मेरी परम मित्र इस्मत जैदी की है। ख़ास बात यह है कि लंबे समय तक इस्मत केवल गद्य की विधा में ही लिखती रहीं। तमाम आलेख और कहानियां उनके नाम पर दर्ज हैं। लेकिन इधर कुछ समय से उन्होंने पद्य की विधा में लिखना शुरू किया है और माशा अल्लाह क्या खूब किया है। )

    बुधवार, 8 जुलाई 2009

    बड़ी हो गई हैं ममता जी....

    दुलहिन ओ दुलहिन ..............देखना ज़रा , मटके वाली निकली है क्या ?"
    अम्मां जी का ध्यान पूजा से हट कर मटके वाली की आवाज़ पर चला गया था, और आदतन उनकी जुबां "दुलहिन -दुलहिन " पुकारने लगी थी .
    बस यही आदत ममता जी को बिल्कुल पसंद नहीं . अब पूजा करने बैठीं हैं तो पूरे मन से भगवान को याद कर लें . भगवान का भजन कर रहीं हैं ; माला फेर रहीं हैं , लेकिन कान और ध्यान गली में है . अस्सी पार कर चुकीं है , लेकिन घर -गृहस्थी से मोह-भंग अभी तक नहीं हुआ। पूरे दिन ........दुल्हिन ये कर लो दुल्हिन वो कर लो.... उफ़!! तंग हो जाती हैं ममता जी। आख़िर उनकी उम्र भी तो अब लड़कपन वाली नहीं रही। तीन-तीन युवा बेटे-बेटियों की माँ हैं, लेकिन अम्मा जी अभी तक नई नवेली दुल्हन की तरह नचाये रहती हैं। उनकी जुबान पर बस दो ही नाम रहते हैं , एक तो भगवान का दूसरा ममता जी का।
    वैसे अम्मा जी भी क्या करें, ले दे कर इकलौती बहू हैं हैं ममता जी। अपनी सारी इच्छाएं, सारे शौक अपनी इस इकलौती बहू में ही तो साकार करती आईं हैं वे। और ममता जी भी बस! अम्मा की आवाजों पर चाहे कितना भी क्यों न झल्लाएं, लेकिन उनका हर काम अम्मा जी से पूछ कर ही होता है। सब्जी क्या बनेगी? मठरी में मोयन कितना देना है? सब अम्मा जी ही बताती हैं। जबकि तीस वर्ष पुरानी दुल्हन पचास वर्षीया ममता जी के हाथ अब अम्मा जी की विधियों के अनुसार ही अभ्यस्त हो चुके हैं। लेकिन तब भी ममता जी की पूछने की और अम्मा जी की बताने की आदत सी हो गई है।
    रोज़मर्रा की साधारण सी सब्जी भी बनानी होगी, तो अम्मा जी विधि बताना शुरू कर देंगीं। और झल्लाती हुई ममता जी का बडबडाना शुरू हो जाएगा- " अरे आता है मुझे, सब्जी बनाना। बुढापा आ गया है मेरा! ........................लेकिन रोज़-रोज़ सब्जी की वही विधि बताने का सिलसिला ख़त्म नहीं कर पा रहीं अम्मा जी। रट गईं हैं सारी विधियां " लेकिन इस बड़बड़ाहट का स्वर बस उतना ही ऊंचा होता जितना उन्हें स्वयं सुनाई दे . इसीलिये तो पिछले तीस सालों से अम्मा जी का विधि बताना और ममता जी का बडबडाना एक साथ जारी है . अम्मा जी के सामने ममता जी ने उनका कभी विरोध नहीं किया। कोई भी पकवान भले ही ममता जी अपनी विधि से बनाएं लेकिन उसकी भी विधि अम्मा से पूछना और फिर उस विधि को पूरा सुनना शायद ममता द्वारा अम्मा जी के प्रति सम्मान प्रकट करने का ही एक तरीका है।

    पचास वर्शेया ममता जी पूरे दिन अम्मा की आवाज़ पर यहाँ-वहां होतीं रहतीं हैं। खीजती भी रहतीं हैं, लेकिन अम्मा का "दुल्हिन" शब्द जैसे उनमें नव-वधु के जैसी ऊर्जा का संचार करता रहता है। अपनी बढ़ती उम्र का अहसास ही नहीं हो पाता उन्हें। माँ को इस कदर काम में जुटे देख कर कभी-कभी बच्चे भी दादी को छेड़ देते हैं-" दादी , अब तो पूजा पाठ में ध्यान लगाओ। कुछ दिनों में ही माँ की भी बहू आ जायेगी, तब भी तुम ऐसे ही 'दुल्हिन-दुल्हिन' करती रहोगी? अरे तुम्हारी बहू अब सास बनने वाली है, अब उनमें भी तो कुछ सास वाले गुन आने दो'

    लेकिन अम्मा पर कोई असर नहीं होता। उल्टे झिड़क देतीं-' अरे हटो रे....अपनी बहू को उसे जैसे रखना हो रखे, मुझे तो बहुएँ बहुओं की तरह ही अच्छीं लगतीं हैं। फिर तुम्हारी माँ बूढी हो गई है क्या? अभी उसकी उमर ही क्या है? फिर अभी तो मैं बैठी हूँ, उसकी बड़ी-बूढी। अभी खेलने-खाने दो उसे। बड़े आए सास बनाने वाले..........
    और अपनी माँ ' के खेलने-खाने ' की कल्पना मात्र से बच्चे हँसते-हँसते लोट-पोत हो जाते। फिर शुरू हो जाता अम्मा जी का बड़-बड़ाना जो देर तक चलता ।
    कितना मना करती हैं ममता जी ,लेकिन इन बच्चों को उन्हें छेड़ने में ही में आता है . अभी पिछले रविवार को ही बच्चों ने मन्दिर जाने का प्लान बनाया । मन्दिर जा रहे थे सो अम्मा को तो जाना ही था। बच्चों ने जिद पकड़ ली - अम्मा अपनी नई चप्पलें ही पहनना। नहीं तो जब भी मन्दिर जाती हो अपनी वही स्पेशल टूटी चप्पल निकालती हो।' अम्मा ने बहुत मना किया लेकिन बच्चों की, 'कोई मिल गया तो?' जैसी दलीलों के आगे अम्मा भी परास्त हो गईं। अपनी नई चप्पलें पहन के चल दीं। मन्दिर के अन्दर पहुंचाते ही भगवान् के ध्यान के स्थान पर चप्पलों की चिंता ने अपनी जगह बना ली। हर दो मिनट के अन्तराल पर -' कोई चप्पल न चुरा ले कहीं' का भजन अम्मा करतीं रहीं। मन्दिर से निकलने पर वही हुआ जिसका अम्मा को डर था। चप्पलें अपनी जगह पर नहीं थीं। किसी ने पार कर दीं थीं। अब क्या था! अम्मा लगीं ज़ोर-ज़ोर से चोर और उसके खानदान को कोसने! जैसे- तैसे उन्हें चुप कराया गया। नंगे पाँव चलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी, लेकिन किसी की भी चप्पल पहनने से उनहोंने इनकार कर दिया। मारे गुस्से के रिक्शे पर भी नहीं बैठीं। बच्चों ने बहुत समझाया, लेकिन बच्चों से ही तो नाराज़ थीं वे। जैसे-तैसे घर आया और गेट खोलने से पहले ही बच्चों की लानत-मलामत शुरू हो गई। जैसे चप्पलें नहीं कोई अनमोल खजाना चोरी हो गया हो।


    लेकिन ये क्या? घर के बरामदे में कदम पाँव रखा ही था, की अम्मा जी की चप्पलें उनका इंतज़ार करती मिलीं। अब तो पूरा मामला अम्मा जी और ममता जी दोनों को ही समझ में आ गया। और अब तक संजीदगी का अभिनय करते बच्चे लोट-पोत हो रहे थे और अम्मा जी कभी इसका तो कभी उसका कान पकड रहीं थीं।

    " दुलहिन...." सोच-विचार में डूबी ममता जी की तंद्रा अम्मा की आवाज़ से भंग हुई।

    "दुलहिन कल करवा-चौथ है, थोड़ा सा चावल तो भिगो दो लड्डू के लिए।" "ठीक है" कह ममता जी चल दीं।

    "दुलहिन....करवा वाली निकली है... खरीद तो लो"

    उफ़......उफ़......उफ़........

    कुछ काम अम्मा ख़ुद क्यों नहीं कर लेतीं? करवा वाली जा रही है, तो उसे रोक लें, खरीद लें। लेकिन नहीं। बाहर आराम कुर्सी पर बैठ कर "दुलहिन-दुलहिन " करना उन्हें ज़्यादा पसंद है। पता नहीं कब बड़ी हो पाएंगी ममता जी! लेकिन प्रत्यक्ष में हाथ का काम छोड़ कर बाहर पहुँच चुकीं थीं , ममता जी।

    सुबह से अम्मा जी की ताकीदें शुरू हो गईं थीं। अरे दुलहिन, ज़रा जल्दी से नहा-धो लेना। और देखो, प्यासी न रहना। नहा के दूध कॉफी जो पीना हो, पी लेना। न भूखा रहना है, न प्यासा। ममता जी को याद है, पच्चीस साल पहले जब ममता जी ब्याह के आईं थीं और उनकी पहली करवा-चौथ पड़ी थी, तो अम्मा जी ने अपने स्वभाव के विपरीत न केवल उन्हें पानी पीने को कहा बल्कि फलाहार भी जबरन ही करवाया।

    पिछले पच्चीस सालों से ये सिलसिला जारी है। कोई भी व्रत हो, अम्मा की ताकीदें शुरू हो जातीं हैं। और ममता जी सर झुकाए नई-नवेली दुल्हन की तरह आज्ञा का पालन करती जातीं। " दुलहिन भारी साड़ी पहनो, पायल पहनो......पूजा की तैयारी ऐसे करो...वो काम वैसे करो..." फिर आदेश , फिर झल्लाना, और फिर पालन। लगता था जैसे ये सिलसिला आजन्म चलता रहेगा। प्रकृति के साथ-साथ ।

    लेकिन ऐसा कभी हुआ है?

    ममता जी स्तब्ध हैं!! समझ ही नहीं पा रहीं की ये क्या हुआ!! अब वे क्या करें? हर पल आदेश देने वाली अम्मा जी चली गईं? लेकिन ऐसे कैसे जा सकतीं हैं? रात में तो अच्छी- भली थीं। खाना भी खाया था। लेकिन ऐसी कैसी सोयी की अब उठने को भी तैयार नहीं? किससे पूछें? क्या करें?

    कमरे में अम्मा जी का पार्थिव शरीर रखा है। लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं। अम्मा जी को ले जाने की तैयारियां हो रहीं हैं। ममता जी अब भी बेखयाली में हैं। कोई क्या कह रहा है, उन्हें सुनाई ही नहीं दे रहा। उन के कानों में तो बस " दुलहिन-दुलहिन" की आवाजें आ रहीं हैं।

    अमा जी को ले गए हैं लोग। खाली घर, खाली दिल, खाली दिमाग और कान?? नहीं.......कान खाली नहीं हैं। ममता जी ने खूब ज़ोर से अपने कान बंद कर लिए हैं, कहीं "दुलहिन" शब्द बाहर न निकल जाए।

    अम्मा के जाते ही अचानक ही बहुत बड़ी हो गईं हैं ममता जी। उम्र के पचासों वर्ष जैसे घेर कर खड़े हो गए हैं उन्हें। बड़प्पन का यह अहसाह चाहा था उन्होंने? यकीनन नहीं।

    मंगलवार, 7 जुलाई 2009

    विलोम

    मुट्ठी भर दिन
    चुटकी भर रातें,
    गगन सी चिंताएँ,
    किसको बताएं?
    जागती सी रातें,
    दिन हुए उनींदे,
    समय का विलोम
    कैसे सुलझाएं?
    भागती सी सड़कें,
    खाली नहीं आसमान,
    दो घड़ी का सन्नाटा ,
    हम कहाँ से पायें?

    मंगलवार, 16 जून 2009

    ओढी हुई सभ्यता

    ’टन-टन-टन’ के साथ घड़ी ने पाँच बजने का संकेत दिया और ऑफिस में टेबिल-कुर्सी खिसकाने,फडफडाते कागजों को फाइलों में बंद करने की आवाजों ने ज़ोर पकड़ लिया। इक्के-दुक्के जूते-चप्पलों की आवाजें मेरे बगल से हो कर गुज़र गईं। प्रत्येक व्यक्ति घर जाने की जल्दी में है। लेकिन मैं? पाँच का घंटा सुनते ही मेरे हाथ-पाँव ढीले पड़ जाते हैं। शरीर जैसे बेजान हो जाता और मैं अपना सर कुर्सी पर टिका, रिलैक्स के मूड में आ जाती। रोज़ ही ऐसा होता है। मुझे घर जाने की कोई जल्दी नहीं रहती। 'अनु, घर नहीं जाना क्या?' 'घर! आं.....हाँ जाना तो है , लेकिन सोचती हूँ एक फाइल और निपटा दूँ। बहुत काम है। 'पता नहीं मधु कब मेरे पास आकर खड़ी हो गई थी। 'छोड़ यार! ऐसे तो ये ऑफिस का काम निकलता ही चला आएगा। तू ज़्यादा ईमानदारी बरतती है न बस इसीलिए तीन-चार एक्स्ट्रा फाइल्स तेरे सर पर चढी रहती है। चल उठ न!''नहीं मधु, तुम जाओ। मैं आती हूँ। बस एक घंटे का काम और है।''क्या बात है, जल्दी ही प्रमोशन लेने के चक्कर में हो क्या? खैर जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।मैं तो चली।' मधु चली गई थी। कहती है, प्रमोशन के लिए इतनी मेहनत करती हूँ। .....बेचारी......... । उसकी समझ में तो मैं एक सुखी- संपन्न परिवार की लड़की हूँ न! लेकिन हमारी संपन्नता को, घरेलू स्थितियों को भला मधु कैसे समझ सकती है, तब जबकि उनके ऊपर हम लोगों ने बड़ी खूबसूरती के साथ रेशमी आवरण चढा रखा हो! हर रेशमी आवरण का अस्तर खुरदुरा होता है, ये भी तो सच है न! थोड़ा सा काम अभी बाकी था। पन्द्रह मिनट और लग जायेंगे। छः बज के पाँच मिनट हो रहे थे, यानि छः बीस तक काम निपट जाएगा, और पौने सात तक मैं घर पहुँच जाउंगी। 'बिटिया सबा छः हो गए' धनीराम था।' हाँ मालूम है ।' इतनी लापरवाही से दिए गए जवाब पर धनीराम खड़ा-खड़ा कभी मुझे कभी फाइलों के ढेर को देख रहा था। बेचारा! मेरे कारण रोज़ ही धनिराम को भी लेट होना पड़ता है। मुझे तो ओवर टाइम मिल जाता है, लेकिन धनीराम को मुफ्त में ही एक घंटा लेट होना पड़ता है। धनीराम को चुप देख कर बड़ा संतोष होता है। की चलो कोई तो है, जो मुझे पलट कर जवाब नहीं देता। छः बज के बीस मिनट हो गए थे . अब मुझे घर चलना चाहिए . घर ! हाँ , घर ही कहना होगा , क्योंकि वहां मेरे पापा हैं, एक अदद सौतेली माँ हैं, और उनके तीन बच्चे हैं, मेरा भी एक भाई है, यानि सगे भाई-बहन हम दो ही हैं। बाकी तीन मेरी दूसरी माँ के हैं। घर के नाम से ही शरीर में असंख्य कांटे से उगने लगते हैं। अजीब दहशत सी होती है, घर के नाम से। हर वक्त चख-चख, एक अजीब सा तनाव वातावरण में घूमता हुआ। सबके दिमाग तनावग्रस्त और चेहरे मुरझाये हुए। बस घर का मौसम कुछ यूँ है, की बादल गरजते और बिजली चमकती रहती है। देखना तो ये होता है, की ये बिजली कब किस पर गिरती है। और हमें न चाहते हुए भी इस बिजली की आग में झुलसना पड़ता है। रह जाता है हमारे पास एक झुलसा हुआ तन और दहकता हुआ मन। बस , इसीलिए घर जाने की इच्छा ही नही होती। लेकिन घर तो जाना ही है न! एक झटके के साथ फाइल्स बंद कर कुर्सी खिसका के मैं उठ गई। बाहर निकल कर मैं धनीराम को नहीं देख रही लेकिन धनीराम मुझे देख रहा है, यह मैं अच्छी तरह महसूस कर रही हूँ। एक दिन तो धनीराम ने टोक ही दिया था , बिटिया ऑफिस से सब पाँच बजे ही चले जाते हैं , तुम क्यों काम करती रहती हो ? और मैं बस मुस्कुरा दी थी . उससे क्या कहती ?मेरे स्टाप तक जाने वाली बस जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रही थी . अपने स्टाप पर उतरने के बाद मेरे पैर घर की ओर जाने से इनकार करने लगते हैं . और मैं उन्हें जबरन घसीटती हुई घर तक ले आती हूँ। रोज़ ही ऐसा होता है। घर के अन्दर से चिरपरिचित चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थीं। बबलू बाहर ही बैठा था। बात करने की गरज से पूछ लिया-'कॉलेज से आ गए?''नहीं। कॉलेज में ही हूँ।' बाप रे!!! ऐसा गुस्से भरा जवाब! समझते देर नहीं लगी की आज भी कुछ हो गया होगा। दबे पाँव अन्दर पहुँच पहुँची और धीरे से अपने कमरे में आ गई। 'नीलू, बड़ी मेम साब आ गईं हैं, उन्हें कमरे में ही चाय दे आ'- विष बुझी आवाज़ सुनाई दी। कमाल है! मैं इतनी छुपती-छुपाती दबे पाँव अपने कमरे में आई तब भी इनकी पैनी निगाहों से बच नहीं पाई। नीलू टेबिल पर चाय रख गई थी। 'साहबों जैसे ठाठ हैं। काम न धाम फ़िर भी कमरे में ही चाय चाहिए!! हम सब तो नौकर हैं। जैसा चाहा, नचा लिया! 'चाय ज़हर हो गई थी, मेरे लिए। मैंने कब कहा की मेरे लिए चाय तुम कमरे में पहुँचाओ? बल्कि मैं तो दबे पाँव इसीलिए आती हूँ , की कपडे बदल कर मैं ख़ुद चाय बना लूंगी। लेकिन बातें सुनाने के लिए चाय भी ख़ुद ही भिजवा देंगी और फिर उसी बात को तत्काल तमाम तानों के साथ सुना भी देंगीं। लो अब पियो चाय! एकदम आंसू ही आ गए मेरे तो। ओह माँ............तुम क्यों चलीं गईं? तुम समझतीं थी हम बड़े हो गए हैं, पापा भी बुढा रहे हैं तो दूसरी शादी नहीं करेंगे। लेकिन तुम ये क्यों भूल गईं , कि जिसके कारण तुमने आत्महत्या की, तुम्हारे जाने के बाद उसका रास्ता तो एकदम साफ़ हो गया न? फिर वो इस घर में क्यों न आती? और आई भी, अपने तीन बच्चों सहित। इनके आते ही हम, मैं और बबलू, दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंके गए। पापा तो अब कुछ बोल ही नहीं पाते। बस कभी-कभी रात गए मेरे कमरे में आते हैं, और मेरे पास आकर मेरे बालों को सहलाते हैं, कहते कुछ भी नहीं। बबलू ने तो जैसे अपने आप को बिल्कुल काट लिया है घर से। बस खाने और सोने का नाता ही रखा है उसने। मुझे भी उकसाता है-' तुम क्यों खटती रहती हो घर में? सुबह जितना खाना तुम बनाती हो क्या उतना हम दोनों ही खाते हैं? इस पूरी फौज का पेट भरने तुम क्यों चूल्हे में घुसी रहती हो? छोड़ दो सब काम। हम तुम होटल में खा लिया करेंगे। बनाएं देवी जी अपना, अपने पतिदेव और इस वानर सेना का भोजन। लेकिन मैं बबलू को कैसे समझाऊं! उसकी तरह फ्री स्टाइल मैं नहीं हो सकती। मज़े की बात तो ये है की सुबह का सारा काम निपटाने दोनों छोटे बच्चों को स्कूल भेजने के बाद भी मुझे सुनना पड़ता है की काम नहीं करती। 'अरे दीदी! आपने चाय नहीं पी?''ओह!! मैं भूल ही गई। ' और उस काढा हुई चाय को होठों से लगा लिया मैंने। 'कुलच्छनी है। चाय के लिए नखरे बता रही है। और घरों में देखा नहीं है, की कैसे लड़कियां काम में खटतीं हैं. काम करना पडे तो आटे दाल का भाव मालूम हो.’ मैं सोचती हूं कि काम भी मैं करती हूं और शायद इसीलिये आटे-दाल का भाव भी मुझे मालूम है. लेकिन इससे क्या? अच्छा ही हुआ जो मैं नौकरी करने लगी. वरना अब तक तो इस गाली-गलौज के कारण मैं भी नींद की गोलियां खा कर सो गई होती, मम्मी की तरह. ’पडी-पडी खाना चाहती है. पता नहीं कब तक मेरी छाती पर मूंग दलती रहेगी. भगवान इसका काला मुंह भी तो नहीं करता. ’ काला मुंह! सबके हाथ पीले होते हैं, मेरा मुं ह काला होने वाला है क्या? हे भगवान! ये दिन भर गालियों के साथ बात करने वाली मम्मी एम.ए. बी.एड हैं कोई मानेगा क्या? मेरी मां और इनमें कितना फ़र्क है! तब सचमुच ही हमारा घर आदर्श हुआ करता था. हम लोग सचमुच ही सभी-सुसंस्कृत थे। लेकिन अब? अब सभ्यता का झूठा आवरण ओढ़ना पड़ता है। सबसे चेहरे पर नकली मुस्कुराहट चिपका कर बात करनी पडती है। वरना हंसने-मुस्कुराने जैसे शब्द तो हमारे शब्दकोष से गायब ही हो गये हैं। मम्मी को गये तीन साल हो गये, और इस बीच हम लोगों ने ज़ोरदार ठहाका लगाया हो, ऐसा मुझे याद नहीं पडता।आज रविवार है . यानि छुट्टी का दिन । सबका प्यारा दिन, लेकिन यही रविवार जो कभी मुझे बेहद प्रिय था, आज काटने को दौडता है. लगता है, कहां भाग जाऊं! लेकिन कहीं भाग भी तो नहीं सकती. ’अनु तुम्हारी सहेली आई है.’ बबलू की आवाज़ थी. जाकर देखा, मधु थी. अच्छा लगा. हम लोग बातें कर रहे थे, लेकिन मैं दर रही थी, कि पता नहीं कब गालियों की खूबसूरत आवाज़ें मेरे कमरे में सुनाई पडने लगें. मधु शायद मेरे चेहरे से परेशानी पढ पा रही थी, समझ रही थी, कि मैं शायद किसी बात पर अनमनी हूं. और उसने पूछ ही लियी-’अनु जब से मैने तुम्हें जाना, तभी से तुम मुझे बेहद गुमसुम सी लगीं. एकदम चुपचाप. न हंसना, न बोलना. मैं ही हूं, जितना बोलती हूं तुम तो बस उतने का जवाब भर दे देती हो. घर का कोई कारण है, या या कोई दूसरी.....’’नहीं-नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है. मेरे घर के सभी लोग बहुत अच्छे हैं. तुम नहीं जानतीं मधु, मेरी मम्मी दूसरी ज़रूर हैं पर मुझे कितना प्यार करतीं हैं. बहुत अच्छी हैं मेरी मम्मी.’मेरी आवाज़ रुंध गई थी. कितना बडा झूठ मैं बोल रही थी, अपने घर की पुरानी मर्यादा को बनाये रखने के लिये.



    बुधवार, 10 जून 2009

    सीमाबद्ध

    'अरे...........क्या कर रहे हो?' जब तक मैं कुछ समझूं, तब तक सुनील मुझे एक प्यारी सी साडी में लपेट चुके थे। और मैं भी अवश, मंत्रमुग्ध सी उसमें लिपटती जा रही थी।
    'अब कुछ समझ में आया की मैं क्या कर रहा था?'
    'आया जनाब , लेकिन अपने स्वेटर पर तो रहम किया होता, सारे फंदे निकल गए...'
    आज हमारी शादी की सालगिरह थी। दस साल हो गए, लेकिन सुनील इस दिन को सेलिब्रेट करना नहीं भूलते। जब से मैं इस घर में आई हूँ, तब से सुनील और उनके घर वालों ने मुझे अपने प्यार-स्नेह से सराबोर कर दिया है। कभी-कभी तो इतना अधिक प्यार असह्य हो जाता है, मेरे लिए। इतने प्यार-दुलार की आदि नहीं हूँ न! पाँच बरस की थी जब मेरी माँ का देहांत हुआ । अपनी कर्कशा चाची के पास ही रही। पापा ने मेरे कारण दूसरी शादी नहीं की अपने माँ-पापा की दुलारी इकलौती बेटी जो थी। उन्हें डर था, की दूसरी माँ पता नहीं मुझे प्यार दे पाएगी या नहीं? लेकिन पापा ने जिस डर से शादी नहीं की, उससे मुझे बचा पाये?
    मुझे अच्छी तरह याद है, मैं आठ बरस की थी तब। रक्षा बंधन का दिन था। अपनी चचेरी बहनों नीलू-शीलू दी के साथ ही मैंने भी मेंहदी लगाई थी। सुबह सबकी हथेलियाँ मेंहदी से लाल हो रही थीं। दोनों दीदियाँ तो अपने हाथों तक पानी पहुँचने ही नहीं देना चाहती थीं। उनकी देखा-देखी मैंने भी पानी से बचने की सोच ली। अपनी छोटी-छोटी रची हुई हथेलियों को देख कर मैं फूली न समा रही थी। तभी चाची की आवाज़ आई-
    'रीतू, चल ये कप धो दे ज़रा। सब को चाय दे दूँ। '
    मैंने निरीह भाव से नीलू दीदी को देखा तो 'जा न..कप धो दे ।' कह कर उनहोंने मुझे झिड़क दिया। आंसू आ गए मेरे लेकिन आंसुओं को ज़ज्ब करना तो बहुत बचपन में ही सीख लिया था मैंने। शायद मेरा नन्हा मन समझ गया था की यहाँ मेरे आंसुओं की कोई कीमत नहीं।
    नहा-धो कर नीलू-शीलू दी और राजू ने नए कपडे पहने थे और मैंने अपनी पुरानी फ्राक जो पापा दीवाली में लाये थे, अपने नन्हें हाथों से धोकर जिसे मैंने रात में ही तकिये के नीचे रख लिया था, पहन ली। राखी पर मेरे कपडों के लिए पापा ने पैसे भेजे थे मुझे मालूम था, लेकिन उससे क्या? उन पैसों का क्या हुआ मुझे नहीं मालूम जानने लायक उम्र भी नहीं थी। मेरे बड़े होने पर पापा ने बताया था की वे मेरे सभी खर्चों -कपडों के लिए नियमित पैसा भेजते थे, लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता की चाची ने मेरे लिए कभी कोई कपडा ख़रीदा हो। जब पापा आते थे तो वही ज़रूरत की तमाम चीज़ें खरीद देते थे। उनमें से भी मुझे क्या मिलता था?
    दोनों दीदियाँ घंटों मुझसे झूला झुलावाया करतीं थीं, और मैं भी बस इस इच्छा से की बाद में मुझे भी पाँच चक्कर झूलने को मिलेंगे, खूब तेज़ झूला झुलाती थी। लेकिन वो पांच चक्कर मुझे कभी नहीं मिलते थे। एक बार पापा ने मुझे ले जाने की बात की थी लेकिन तब चाची ने जबरन रोक लिया था, उनकी स्थाई नौकरानी न चली जाए इस डर से। मैं भी चाह कर भी जाने की बात नहीं कह पाई थी। कुछ बोलने का कभी मुझे मौका ही नहीं मिला। और शायद इसीलिये मेरे शब्द मुझसे रूठ गए थे। अब मैं चाह कर भी अपनी बात किसी को समझा ही नहीं पाती।
    दिन हो या रात ज़रूरत पड़ने पर मुझे ही बुलाया जाता था। ज़रा सा काम बिगडा नहीं की चाची के ज़ोरदार थप्पड़ चेहरा लाल कर देते थे। अपनी माँ की दुलारी छुईमुई सी मैं, चाची के डर से काम और भी ज़्यादा बिगडते,मार और ज़्यादा पडती। इसी तरह डांट, फटकार,मार और झिड़कियों के बीच बचपन बीता मेरा। कालेज में आ गई थी मैं । उन्ही दिनों नीलू दी की शादी हो गई थी और शीलू दी के लिए जोर -शोर से लड़का ढूँढा जा रहा था . लेकिन कहीं भी बात तय नहीं हो पा रही थी . जो दो चार लडके शीलू दी को देखने आये थे, वे मुझे पसंद कर गये। इन बातों से शीलू दी मुझसे और अधिक चिढने लगीं थीं। चाची का सारा गुस्सा भी मुझ पर ही निकलता था। लेकिन अब मेर युवा होता मन विद्रोह करना चाहता था। लेकिन विद्रोह करके जाती कहां? पापा तो इतने तटस्थ हो गये थे कि मुझे महसूस ही नहीं होता था कि वे मेरे पापा हैं। हर महीने पैसे भेज कर ही उनहोंने अपने दायित्व की इतिश्री कर ली थी।
    उन्हीं दिनों सुनील के यहां शीलू दी की शादी की बात चली थी। और हर बार की तरह इस बार भी जब सुनील पैवार सहित शीलू दी को देखने आये तो मुझे पसन्द कर चले गये। लेकिन इस बार सुनील पिछले लडकों की तरह चाचा के मना करने पर मान नहीं गये वरन ज़िद ही कर ली मुझे ब्याहने की। पापा को भी सुनील पसंद आये और फ़िर आनन-फ़ानन मेरा ब्याह हो गया। शायद पापा को भी जल्दी थी, मुझे उस घर से निकालने की।
    बस इस तरह मैं सुनील की ज़िन्दगी में आ गई और तब से ही सुनील ने पलकों पर बिठाया है मुझे। हर दुख-दर्द को बराबरी के साथ महसूस किया है उन्होंने।
    ’अरे!! देवी जी अभी तक यहीं विराजमान हैं?’ बुरी तरह चौंक गई थी सुनील की आवाज़ पर।
    ’रीतू, हमारी शादी को दस साल हो गये लेकिन तुम्हारी ये चौंकने-सहम जाने की आदत अभी तक गई नहीं। तुम्हारे इस तरह सहम जाने से मुझे बहुत दुख होता है। तुम ये क्यों भूल जाती हो कि तुम अब उस कारागार में नहीं अपने घर में हो। जो कि पूरी तरह तुम पर आश्रित है। इस घर का प्रत्येक सदस्य तुम्हारा मुंह जोहता है, तुम किसी की मोहताज नहीं हो। तुम्हें इस तरह सिमटते देख कर लगता है, कि मेरे प्यार में ही कोई कमी है जो तुम अभी तक अपने भीतर समाये भय को बाहर नहीं निकाल पाईं।’
    मैं तुम्हें कैसे समझाऊं सुनील कि जिसे शैशव से लेकर युवावस्था तक केवल मार-डांट ही मिली हो कडी से कडी सज़ा ही जिसके हिस्से में आई हो, उसके मन से भय इतनी आसानी से कैसे निकल सकता है? पहले सबकी डांट से सहमी रहती थी, अब तुम्हारे अत्यधिक प्यार से सहमी रहते हूं। प्लीज़ सुनील, मुझे इतना अधिक प्यार मत दो कि मैं उसे बर्दाश्त ही न कर पाऊं। मुझे सीमाबद्ध प्यार चाहिये, दे पाओगे सुनील?
    मेरी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह चली थी, जिसे सुनील कुछ समझे, कुछ नहीं।

    सोमवार, 1 जून 2009

    मेरी पसंद के खजाने से...

    टूटते लम्हों को मुट्ठी में जकड़ने वालो,
    क्या मिलेगा तुम्हें,परछाईं से लड़ने वालो।
    उम्र भर बैठ कर रोना कोई आसान नहीं,
    अपनी यादें भी लिए जाओ,बिछड़ने वालो.