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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मेरी पसंद....

जिन्हें अच्छे बुरे हर हाल में रब याद आता है

भुलाना चाहता हूं मैं मगर सब याद आता है
तेरी यादों ने बख़्शा है जो मन्सब याद आता है

सितम बे-महर रातों का मुझे जब याद आता है
इन्हीं तारीकियों में था जो नख़्शब याद आता है

हर इक इंसान उलझा है यहां अपने मसाइल में
परेशां और भी होंगे किसे कब याद आता है

दलीलों के लिए तो सैकड़ों पहलू भी हैं लेकिन
जो सोचूं तो मुझे अच्छा बुरा सब याद आता है

वहां की सादगी में दर्स है रिश्तों की अज़मत का
जिसे तुम गांव कहते हो वो मकतब याद आता है

लिया है काम ऐसे भी सियासत ने अक़ायद से
उठाने हों अगर फ़ितने तो मज़हब याद आता है

हैं बंदे तो सभी लेकिन वो मोमिन हो गए ’शाहिद’
जिन्हें अच्छे बुरे हर हाल में रब याद आता है

शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद"

रविवार, 8 नवंबर 2009

मेरी पसंद

निहत्थे आदमी के हाथ में हिम्मत ही काफ़ी है,
हवा का रुख बदलने के लिये चाहत ही काफ़ी है.

ज़रूरत ही नहीं अहसास को अल्फ़ाज़ की कोई,
समुन्दर की तरह अहसास में शिद्दत ही काफ़ी है.

बडे हथियार लेकर लेकर जंग में शामिल हुए लोगों
बुराई से निपटने के लिये कुदरत ही काफ़ी है.

किसी दिलदार की दीवार किस्मत में नहीं तो क्या
ये छप्पर, झोपडे , खपरैल की यह छत ही काफ़ी है.

माधव कौशिक

( "अंगारों पर नंगे पांव" से साभार)