हर अच्छे काम का श्रेय
लेते हम अपने सर,
और गलतियों को
मढ़ देते ईश्वर पर।
क्या करता है वह
हमेशा काम ग़लत?
तो फिर कोई
क्यों पूजे उसकी मूरत?