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मंगलवार, 21 सितंबर 2010

मेरी पसंद....


दुष्यंत कुमार

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

सोमवार, 8 मार्च 2010

मेरी पसंद....

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,


आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है.



ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,


यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है.



एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,


इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है.



मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,


तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है.



इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके,


जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है.



कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,


मैंने पूछा नाम तो बोला की हिदुस्तान है.



मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,


हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है.



दुष्यंत कुमार


अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष पर शुभकामनाएं.