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गुरुवार, 14 जनवरी 2010

मेरी पसंद....


वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है.

वे कर रहे हैं इश्क पे संजीदा गुफ़्तगु,
मैं क्या बताऊँ, मेरा कहीं और ध्यान है.

सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर,
झोले में उसके पास कोई संविधान है.

उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप,
वो आदमी नया है मगर सावधान है.

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए,
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है.

देखे हैं हमने दौर कई, अब खबर नहीं,
पांवों तले ज़मीन है या आसमान है.

वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेजुबान है.

दुष्यंत कुमार