गुरुवार, 21 जनवरी 2010

दस का नोट


दस का नोट
"मम्मी तुम भी कमाल करती हो! भला दस रुपये लेकर मेला जाया जा सकता है?"



"क्यों? दस रूपये ,रुपये नहीं होते? फिर तुम्हें झूला ही तो झूलना है, इसमें तो दो बार झूल लोगी..."



"अच्छा!!! किस जमाने में हो तुम? दस रूपये में तो झूले वाला झूले की तरफ देखने भी नहीं देगा।"



"लेकिन............"



"कुछ नहीं...रख लो तुम अपना ये नोट...मैं नहीं जाउंगी मेला-ठेला। सबसे कह दूँगी की मेरी मम्मी के पास पैसे ही नहीं हैं......क्योंकि बेचारी वो प्रोफेसर ही तो हैं...."




दस का नोट
"दस रूपये का नोट ,जो नीलू ने मेरी ओर तैश में आकर फ़ेंक दिया था, फडफडाता हुआ कमरे में चक्कर लगा रहा था। नीलू ने अपने कमरे में जाकर भड़ से दरवाज़ा बंद कर लिया था। नीलू मेरी चौदह बरस की बेटी अभी से कितनी व्यंग्य भरी बातें करने लगी है....उसका इतना बढ़-चढ़ कर बोलना , शायद मेरे अधिक लाड -प्यार का ही नतीजा है. अभी जिस तरह नीलू इस दस के नोट को मेरी ओर उछाल कर गयी, क्या मैं अपनी माँ के साथ ऐसा कर सकती थी?मैंने अपने बच्चों को अधिक लाड-प्यार सिर्फ इसलिए दिया,की वे भी मेरी तरह माँ के प्यार से वंचित न रह जाएँ। लेकिन इसका बदला मुझे जिस तरह मिल रहा है, वो मैं देख रही हूँ, महसूस कर रही हूँ,लेकिन इस स्थिति से उबरने का प्रयास नहीं कर रही। यह जानते हुए, की मैं बच्चों की जिन आदतों को शाह दे रही हूँ, वे मेरे,रवि के और ख़ुद बच्चों के लिए हितकर नहीं है। दस का नोट अब कमरे में मेरे डबलबेड के पाये से लग कर स्थिर हो गया है। इस दस के नोट से मेरी किशोरावस्था का गहरा सम्बन्ध है। बचपन में तो हाथ पर दस पैसे से ज़्यादा कभी आए ही नहीं। पन्द्रह बरस की हुई तब से कहीं भी जाऊं,मेला, बाज़ार, या सालगिरह; दस का नोट मेरे साथ चलता मेरी मुट्ठी में कसमसाता। कभी उसके खर्च होने की नौबत ही नहीं आती थी, क्योंकि दस रुपये में उस वक्त भी केवल चाट ही मिल सकती थी.फिर भी उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। शायद इसीलिये दस के नोट से मेरी गहरी आत्मीयता है।




दस का नोट
"मम्मी , और रुपये दे रही हो? मेरी समझ में नहीं आता की कभी-कभी तुम्हें क्या हो जाता है?मैं कहीं भी जाऊं, तो तुम दस का नोट ही क्यों हिलाने लगाती हो मेरे सामने ? मेरी फ्रेंड्स देखो, इतने बड़े-बड़े घर कि लड़कियां है, खूब खर्च करतीं हैं। फिर मैं भी तो गरीब नहीं हूँ। मैं ही क्यों हाथ बांधे रहूँ?"



नीलू की किसी भी बात का उत्तर देने की , डांटने की मेरी इच्छा ही नहीं हुई। नीलू मेरे कुछ भी न बोलने से और खीझ गई थी। उसकी सहेलियां भी आ गईं थीं। और अब नीलू मेरी अलमारी के पास थी। बड़े इत्मीनान से उसने सौ का एक नया नोट निकाला।



" मम्मी मैं ये सौ रुपये ले जा रही हूँ, पूरा खर्च नहीं करूंगी। "



कहने को तो कह गई है, की पूरा खर्च नहीं करुँगी, लेकिन लौटने पर बीसों खर्चे होंगे उसकी जुबां पर। मेरी सहेलियां भी सभी बड़े घरों की थीं और खर्चीली भी। उनके बीच मैं अपने आप को बेहद हीन महसूस करती। ये बड़े घर की बेटियाँ मेरी दोस्त थी, तो केवल इसलिए क्योंकि पढाई में ये सब मेरी बराबरी नहीं कर सकतीं थी।




दस का नोट
"मुझे अच्छी तरह याद है, मैं बी.एससी। प्रथम वर्ष में थी,हमारे शहर में मेला लगा था सबने वहाँ जाने का प्रोग्राम बनाया, मम्मी ने उस दिन भी मुझे दस रुपये ही दिए थे और मैं सोचती रह गई थी की इस दस के नोट का मेले में क्या करूंगी? मेले में पहुँचने के बाद मेरी फ्रेंड्स जो भी खरीदतीं मुझे कहतीं , लेकिन इस सब का मेरे पास एक ही उत्तर होता, मैं चाट खाती ही नहीं, मुझे चूडियों का तो शौक ही नहीं... आदि-आदि। मेरे पास इतने पैसे ही नही होते थे की मैं ये सब खरीद सकूं। अपने दस के नोट को मुट्ठी मैं कसे वापस आ गई।



"एक मैं थी जो और पैसों के लिए कभी मुंह नहीं खोल पाई, एक मेरे बच्चे हैं.....इनकी स्वार्थ पूर्ति में ज़रा भी कम आई नहीं की इनकी जुबान की मिठास में भी तेज़ी से गिरावट आने लगती है। इनके सामने मैं जो की अपने स्टाफ में बेहद सख्त मानी जाती हूँ, कुछ कह ही नहीं पाती। घर में रहती हूँ तो मेरा बचपन मुझ पर हाबी रहता है। मैं सोचती हूँ की क्या मैं अपने बच्चों में कम खर्च करने की आदत डाल सकती हूँ? लेकिन इस महंगाई और आधुनिकता के कदम से कदम मिलाकर चलने वाली पीढी को दस के नोट से कैसे बहलाया जा सकता है?



करने को मेरे पास कुछ था नहीं, उठी और दस के नोट को सहेज दिया सौ के नोट कि खाली हुई जगह में.


( बन्धुवर, ये कहानी मैने 1983 में लिखी थी. अपनी किशोरावस्था में. तब दस के नोट का महत्व था. बिना किसी काट-छांट के इसे प्रस्तुत करने की धृष्टता, दोबारा कर रही हूं.)

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

मेरी पसंद....


वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है.

वे कर रहे हैं इश्क पे संजीदा गुफ़्तगु,
मैं क्या बताऊँ, मेरा कहीं और ध्यान है.

सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर,
झोले में उसके पास कोई संविधान है.

उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप,
वो आदमी नया है मगर सावधान है.

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए,
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है.

देखे हैं हमने दौर कई, अब खबर नहीं,
पांवों तले ज़मीन है या आसमान है.

वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेजुबान है.

दुष्यंत कुमार


गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

अनिश्चितता में....

अनिश्चितता में....
ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म से आ लगी थी। ट्रेन के आते ही लोगों की गहमागहमी अचानक ही बढ़ गई थी। यहाँ से वहां लाल यूनिफार्म में दौड़ते कुली , डिब्बे में जगह लेने को बेताब यात्री। और इस भीड़ से घिरा मैं। मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे की तरफ़ चल पड़ा। रिज़र्वेशन तो था नहीं सो जनरल डिब्बे में ही घुसना था, सो घुस गया. खड़े होने लायक जगह मिल गई थी। प्लेटफार्म पर अब वे ही लोग रह गए थे जो अपने मित्रों, या रिश्तेदारों को छोड़ने आए थे ,और अब ट्रेन के चलते ही हाथ हिलाने लगे थे। इस डिब्बे में केवल मैं ही ऐसा व्यक्ति था, जिसे कोई छोड़ने नहीं आया था। ऐसा नहीं है की मेरे घर में कोई है ही नहीं मां-पापा,दो भाई सब हैं,लेकिन इन सब के होते हुए भी मैं कितना अकेला हो गया हूँ। इसी अकेलेपन से बचने, पता नहीं कहाँ जा रहा हूँ मैं............

'भाई साहब आप चाहें तो यहाँ बैठ जाएँ, मैं अगले स्टेशन पर ही उतारूंगा...' कोई छोटा सा स्टेशन आने वाला था । पहली बार मेरी किस्मत ने साथ दिया था। ऐसी ठसाठस भरी ट्रेन में जगह मिल गई थी। आराम से बैठ कर एक मैगजीन के पन्ने पलटने लगा था। ट्रेन पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। मेरा घर , मेरा शहर बहुत पीछे छूट गया था।
पिछले कुछ महीनों में घर के माहौल में जो परिवर्तन आया था, वह निश्चित रूप से दुखदायी था। यह परिवर्तन भी तो अचानक ही आया था। और इसकी तह में राजू, मेरे छोटे भाई की नौकरी लग जाना था। राजू की बी.ई.की डिग्री रंग लाई थी, उसका सेलेक्शन शहर के ही एक प्रतिष्ठित संस्थान में हो गया था। राजू मुझसे दो साल छोटा है। पढने में तेज़ है, इसमें कोई शक नहीं , लेकिन मैं भी तो एम्.एस.सी करके बैठा हूँ, वो भी ७५% लाकर। ये अलग बात है, की अब इस तरह की डिग्रियों से कुछ होता नहीं। शायद इसीलिए पिछले दो सालों से बेकार बैठा हूँ। लगातार कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता रहता हूँ,लेकिन हासिल क्या होता है?मैं ख़ुद से परेशान हूँ। राजू को छः महीने की ट्रेनिंग पर बाहर जाना था बस उसके जाते ही घर के माहौल में जिस तेज़ी के साथ परिवर्तन हुआ, उसे देखते, मह्सूते हुए घर में रह पाना बड़ा मुश्किल था, मेरे लिए। अभी भी नौकरी का कोई ठीक-ठिकाना न होते हुए भी मैं लखनऊ जा रहा हूँ, अपने एक दोस्त के पास , जिसने अपने ऑफिस में कोई काम की बात कर के रखी है। कुछ भी मिलेगा, कम से कम अपने आवेदन पत्र तो ख़ुद के पैसों से खरीद सकूंगा।

अभी एक महीने पहले तो पापा ने साफ़-साफ़ कह दिया था। उस दिन पापा बड़े गुस्से में थे। कारण, बैंक का रिज़ल्ट आ गया था, और में उस में भी नहीं निकल सका था। दुनिया भर के सफल लड़कों के उदाहरण दे-दे कर डांटते रहे कितनी बातें सुनाई। गुस्से में उनके मुंह से निकल ही गया, "आख़िर कब तक खिलाऊंगा तुम लोगों को?" लोगों को? लोग अब थे ही कहाँ? राजू की नौकरी लग गई थी , छोटा भाई अभी पढ़ रहा था। यानि पापा अब सिर्फ़ मुझे ही खिलने में असमर्थ थे? मैं ही घर के लिए बोझ बन रहा था। उसी दिन मैंने सोच लिया था की अब पापा से पैसे नहीं मांगूगा कभी। और पड़ोस के एक लड़के को ट्यूशन पढ़ने लगा था। महीने के अंत में पाँच सौ रु.मिल गए थे मुझे।

वे मेरी भागदौड के प्रारम्भिक दिन थे जब मैं सोचता था की नौकरी लगते ही मैं राजू को एम्.ई.ज़रूर करवाऊंगा, लेकिन मैं सोचता ही रह गया और राजू की नौकरी भी लग गई। एक दिन मुझे उदास देख कर राजू ने कहा था , की "भइया, आप अपने बैंक ड्राफ्ट के लिए हमेशा चिंता करते रहते हो न, बस छः महीने बाद मेरी पोस्टिंग हो जायेगी तब फ़िर तुम आराम से कितने भी आवेदन करते रहना.....पैसों की कोई चिंता नहीं..." मैं राजू का चेहरा देखता रह गया। हांलांकि उसने एकदम सरलता से ही ये कहा था, लेकिन मुझे लगा की कहाँ मैं इसे एम्.ई.करवाने की बात करता था और अब यही मुझे आवेदन-पत्रों के लिए पैसे देगा!! यानी राजू को पूरा भरोसा था, की इन छः महीनों में उसके भइया की नौकरी कहीं भी नहीं लगने वाली। और अब जब राजू तीन दिन बाद घर लौट रहा है, मैं जा रहा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ,की उसके आते ही घर के सारे सदस्य मेरी उपेक्षा करते हुए जताएंगे की मैं बेरोजगार हूँ। निश्चित रूप से मैं इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर सकता। वैसे भी मैं राजू के सामने जाने में अजीब शर्म सी महसूस कर रहा था।

ट्रेन लखनऊ स्टेशन पर आकर लग गई थी । नीचे खड़े लोग तेज़ी से ऊपर आना चाह रहे थे , और अन्दर से उतरने वाले उन्हें धकियाते, झिडकते नीचे उतर रहे थे। जल्दी से जल्दी स्टेशन से बाहर निकल घर पहुँचने को सबके बेताब कदम । लेकिन मुझे कहीं जाने की जल्दी नहीं है।

ट्रेन ने सरकते-सरकते फ़िर गति पकड़ ली है, और प्लेटफार्म छोड़ अपने गंतव्य को बढ़ गई है, लेकिन मैं अभी तक प्लेटफार्म पकड़े हूँ, क्योंकि मुझे तो अपना गंतव्य भी ज्ञात नहीं।

(कल आठ दिवसीय प्रवास पर कानपुर जा रही हूं, इस बीच मेरी ये पुरानी कहानी ही पढिये न, इसे पूर्व में बहुत कम पढा गया था, चाहती हूं कि इसे भी आप सब पढें और अपनी राय से अवगत करायें. मेरी इस धृष्ट्ता को माफ़ करेंगे न?)

शनिवार, 28 नवंबर 2009

दस्तक के बाद

साड़ियाँ
सारा कमरा बनारसी साड़ियों, सूट के कपड़ों, बच्चों के कपड़ों, शाल, स्वेटर और जेवरों से अटा पड़ा था.
बहुत प्यारी-प्यारी साड़ियाँ थी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी तो बहुत ही प्यारी थी. मनीष, निशि , रीना और सीमा इन चारों के ऊपर कपड़े खरीदने की ज़िम्मेदारी थी, जिसे इन लोगों ने बखूबी निभाया था.
' मम्मी- चलो सबको कपड़े दिखा दूं , और बाँट दूं '
यह जानने के लिए तो सभी उत्सुक थे, की कौन से कपड़े किसके हिस्से में आने वाले हैं. सो एक आवाज़ में ही सारे लोग कमरे में जमा हो गए थे.
"ऐ सीमा , ये नीले रंग की साड़ी तो बहुत प्यारी है, मैं तो यही लूंगी. मम्मी देखो ये पांच बनारसी और दो कांजीवरम साड़ियाँ शुची के लिए थी हैं न?"
"बहुत बढियां हैं. सुनील ने ही पसंद की है न ? बस शुची को भी पसंद आएगी."
" ये दो साड़ियाँ निशि के लिए और ये एक साड़ी और दो सूट के कपड़े रीना के लिए ये दो साड़ियाँ सीमा के लिए..............................
"ये कपड़े मेरे, ये सुनील के, ये के बच्चों के ..........."
साड़ियाँ तो सारी बँट गई मेरे लिए तो कोई साड़ी निकली ही नहीं. भूल गया है क्या मनीष? अरे हाँ अभी वो प्याजी रंग की साड़ी तो रखी है शायद वही मेरे लिए लाये होंगे ये लोग.
" मम्मी ये साड़ी तुम्हारी- रंग अच्छा है न , तुम्हारे लिहाज से तो ठीक ही है "
मनीष एक एकदम हलके क्रीम कलर की सिल्क की साड़ी मेरी तरफ बढ़ा रहा था और मैं? मैं न उसे ले पा रही थी और ना ही कुछ कह पा रही थी . मैं क्या इतनी बूढी हो गयी हूँ? क्या मैं अब कामदार साड़ियाँ पहनने के लायक नहीं रह गयी हूँ ? इन लोगों ने यह कैसे मान लिया की मेरी इच्छाएं मर गयी हैं जो कुछ ये पहना देंगे मैं पहन लूंगी? सीमा, निरीह भाव से मुझे देखने लगी थी.
" ये एक कांजीवरम साड़ी बच रही है.........
" अरे वाह ! बच रही है तो क्यों न मैं ही लेलूँ"
' निशि मैं सोच रही थी कि ये साड़ी भाभी के लिए ठीक रहेगी"
" मम्मी के लिए? अरे अब इस उम्र में मम्मी इसे क्या पहनेंगी? है न मम्मी?"
" हाँ तुम्ही ले लो."
कह दिया था मैंने लेकिन मन बेहद दुखी हो गया था . उम्र के साथ-साथ इच्छाएं भी मर जाती हैं ; ऐसा हमारे युवा होते बेटे, बेटियाँ, बहुएं क्यों सोचने लगते हैं? फिर मैं अभी पचपन की ही तो हूँ. फिर मुझे अच्छे अच्छे कपड़े, साड़ियाँ पहनने का शौक भी बहुत है. अनावश्यक श्रृंगार तो मुझे वैसे ही पसंद नहीं है. पैंतीस वर्ष बीत चुके हैं हम लोगों के वैवाहिक जीवन को . मैं बीस की थी जब हमारी शादी हुई थी एक बेहद सौम्य , सरल और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अनिल मुझे मिले थे. बेहद प्यार करने वाले . मैं खूब सज-संवर के रहूँ, अनिल की यही इच्छा रहती थी. अब तो अनिल भी बेहद चुप-चुप से हो गए हैं. घर में जो कुछ हो रहा है उसे बस निर्लिप्त भाव से देखते रहते हैं.
मन कैसा अजीब सा हो गया था. अपने भीतर आंसुओं का सैलाब सा उमड़ता महसूस किया था मैंने. धत! कैसी पगली हूँ मैं! ठीक ही तो कहते हैं लड़के. भला अब इस उम्र में मैं कामदार साड़ियां पहनूंगी? सांत्वना दी थी मन को. अब जिनके साथ रहना है, उस नई पीढ़ी के साथ एडजस्ट करके ही चलना होगा, वर्ना उनका क्या है, मैं ही आंसू बहाती , मानसिक व्यथा लिए रहूंगी.
शाम को अनिल ने ऑफिस से लौटते ही मुझे आवाज़ दी थी.
"तुम्हारे लिए साड़ी लाया हूँ. वैसे मनीष तो ले ही आया होगा लेकिन ये मेरी तरफ से. शादी वाले दिन यही पहनोगी तुम."
बेहद प्यारी गुलाबी रंग की ज़री के काम वाली सिल्क साड़ी थी.
" लेकिन अब इस उम्र में ये साड़ी पहनते अच्छी लगूंगी क्या?"
"क्यों? इस उम्र से तुम्हारा क्या मतलब है? तुम बूढी हो गई हो क्या? अरे तुम तो अपनी बहू से कहीं ज्यादा अच्छी लगती हो, अभी भी."
और दिन भर के जमा हुए आंसूं सारे बाँध तोड़ के बह निकले थे. अनिल की साड़ी को आँखों से लगा, फूट-फूट के रो पड़ी थी मैं. और अनिल पूरे वाकये से अनजान, परेशान , मेरे रोने से हतवाक खड़े थे. उनकी समझ में नहीं आ रहा था की अचानक मुझे क्या हुआ? लेकिन मैं जानती थी की अब इस साड़ी को लेकर मेरा और अनिल का अच्छा ख़ासा मज़ाक बनाया जाएगा. " बुढापे का प्रेम" कह कर खिल्ली उड़ाई जायेगी. खुद हमारे बच्चे ही हमारा मज़ाक उड़ायेंगे.
जब तक ये तीनों होस्टल में रह कर पढ़ रहे थे, तब तक हम लोगों को अपनी उम्र का अहसास ही नहीं था. लेकिन अब कदम-कदम पर हमें उम्र का अहसास कराया जाता है.
घडी ने चार बजने का संकेत दिया था. अरे!! तो क्या सारी रात मैंने जागते हुए ही गुज़ार दी? मैं अपने प्रति ही ग्लानि से भर उठी थी. सच तो है. बुढ़ापा तो आ ही गया है मेरा. मैं महसूस नहीं कर पाती लेकिन देखने वाले तो महसूस करते हैं न. बच्चे मेरी उम्र के हिसाब से काम करते हैं तो इसमें गलत क्या है? आखिर मैं अपनी उम्र को स्वीकार क्यों नहीं कर पाती? और सचमुच मन को बड़ी शान्ति मिली थी इस विचार मात्र से.
" मम्मी, कितनी देर से जगा रही हूँ. आठ बज रहे हैं. तुम्हारे बिना तो कुछ होने का नहीं. उठो न जल्दी."
रीना जगा रही थी. चाय पर सब मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन सब मेरी और ऐसे क्यों देख रहे हैं? आज आठ बजे तक सोती रही तो जैसे कोई अनहोनी हो गई! सब तो रोज़ ही आठ बजे तक सोते हैं. मन फिर उदास हो गया था. आखिर ये सब मुझे समझते क्या हैं? इन सब के लिए मेरी हैसियत क्या है?
घर में शादी का माहौल था. वातावरण में खिलखिलाहटें और कहकहे घुले-मिले रहते थे. लेकिन मेरा मन खिन्नता से भरा रहता था. सबसे झल्ला के बोलती थी. हमेशा बडबडाती रहती थी. और शायद इन सभी के हंसी-ठहाकों के बीच मैं ही तनाव पैदा करती थी.
कल बारात जाने वाली थी. घर में बड़ा अच्छा लग रहा था. सुनील भी हल्दी लगाए पूरे घर में घूम रहा था. बहुत खुश था लड़का. आखिर शुचि से किया हुआ वायदा जो पूरा हो रहा था उसका. मैं भी खुश थी क्योंकि मैंने तय कर लिया था की मैं अनिल की लाई कामदार साड़ी ही पहनूंगी. चाहे कोई कुछ भी कहे.
बड़े जतन से अपने बालों में छिटकी चांदी को डाई करके काले बालों में मिलाया. चेहरे को मलाई से चमकाया. बारात उसी शहर में जानी थी सो सारे काम इत्मीनान से निपटा रही थी. ज़री से जगमग होती साड़ी पहनी. उसके साथ मैच करते आभूषण भी पहने. और अब बेहद खुश थी की मैं निशि से ज्यादा अच्छी लग रही हूँ. अनिल ने मुझे देखा, बोले कुछ नहीं( लो भला!! तारीफ़ तक नहीं कर सकते?) बच्चों ने भी कुछ नहीं कहा. न कहें. जलते हैं मुझसे. घर के अन्य मेहमान तो तारीफों का पुलिंदा बाँध रहे हैं न? यही काफी है. अपनी सज्जा के बल पर लगभग पांच वर्ष छुपा लिए थे मैंने अपनी उम्र के . और अब अपनी भावी समधिन , जिनकी सुन्दरता के बहुत कशीदे सुनील काढता रहता है, का मुकाबला करने को तैयार थी.
बारात
बारात शुचि के दरवाजे पर पहुँच गई थी. मेरी नज़रें बस शुचि की माँ को ही तलाश कर रही थीं. जो भी गहनों, जडाऊ साड़ी से लकदक महिला दिखती , तो मैं सोचती की यही है क्या शुचि की माँ?
" हम सब की और से ढेरों ढेर बधाईयाँ, शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये."
इस आवाज़ ने तन्द्रा भंग की थी मेरी.
अरे!!! यही है क्या शुचि की माँ? सिल्क की क्रीम, लाल बोर्डर की साड़ी पहने, माथे पर सिन्दूर की लाल बड़ी सी बिंदी लगाये, बालों को एक ढीले से जूड़े के रूप में लपेटे, सर पर पल्लू लिए हुए मेरे सामने एक बेहद सौम्य महिला खड़ी थी. मेरे दोनों हाथ अपने आप अभिवादन में जुड़ गए. उनहोंने बड़े प्यार से मेरे हाथों को थाम लिया था, और भीतर ले चलीं थीं.
उस सादगी भरे व्यक्तित्व में कैसा गज़ब का आकर्षण था! वहां ढेरों जडाऊ साड़ियों के बीच उनका सादा वस्त्रों में लिपटा मोहक व्यक्तित्व अलग ही दिपदिप कर रहा था. मेरे मुंह से शर्म के मारे शब्द ही नहीं निकल रहे थे. वे भी तो मेरी ही उम्र की हैं, लेकिन कितनी सरल, सौम्य और सादगी से भरपूर. एक मैं हूँ, जो अपनी उम्र को ताक पे रख के गहनों, साड़ियों के पीछे दौडती फिरती हूँ.
मेरे गहने मुझे काटने लगे थे. मेरी भारी साड़ी जो अभी तक अपने रेशमी अहसास से मुझे आनंदित कर रही थी, अब चुभने लगी थी. मुझे लग रहा था की मेरे सफ़ेद बाल जिन्हें मैंने बड़े जतन से काला किया है, अपनी पूर्णता के साथ झलकने लगें. मैं वही मनीष की लाई साड़ी पहन लूं.
सचमुच बच्चे सही मूल्यांकन करते हैं हमारा, हमारी उम्र का और उसके हिसाब से होने वाले प्रत्येक कार्य का. आज मुझे अपनी उम्र का भरपूर अहसास हुआ था. मैं खुद उसे महसूस करना चाहती थी आज, अभी, इसी वक्त.
मुझे लगा था की बुढ़ापा दस्तक देने लगा है. नहीं..........दस्तक देने के बाद आधा सफ़र भी तय कर चुका है..

रविवार, 8 नवंबर 2009

मेरी पसंद

निहत्थे आदमी के हाथ में हिम्मत ही काफ़ी है,
हवा का रुख बदलने के लिये चाहत ही काफ़ी है.

ज़रूरत ही नहीं अहसास को अल्फ़ाज़ की कोई,
समुन्दर की तरह अहसास में शिद्दत ही काफ़ी है.

बडे हथियार लेकर लेकर जंग में शामिल हुए लोगों
बुराई से निपटने के लिये कुदरत ही काफ़ी है.

किसी दिलदार की दीवार किस्मत में नहीं तो क्या
ये छप्पर, झोपडे , खपरैल की यह छत ही काफ़ी है.

माधव कौशिक

( "अंगारों पर नंगे पांव" से साभार)

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

अहसास

"बडकी, टेबल पे नाश्ता तो लगा दो; बारात लौटने से पहले सब कम से कम नाश्ता ही कर लें....."

"बडकी ...... बड़ी जीजी को गरम पानी नहीं दिया क्या? कब नहायेंगीं ? बारात आने ही वाली है.........."

"बडकी....परछन का थाल तैयार किया या नहीं ?.....दुल्हन दरवाजे पर आ जायेगी तब करोगी क्या?"

बडकी -बडकी-बडकी............सबको बस एक ही नाम याद रहता है जैसे......... मेहमानों से ठसाठस भरे इस घर में काम की ज़िम्मेदारी केवल बडकी की...... मशीन बन गई है बडकी जब से छोटे देवर अभय की शादी तय हुई....


शादी भी ऐसे आनन-फानन की कुछ सोचने - प्लान करने का वक्त ही नहीं.... वैसे बडकी यानि बड़ी बहू अलका को कुछ प्लान करने का हक़ ही कहाँ है ? उसके हिस्से में तो केवल कर्तव्य ही आया है। छोटे घर की है न!! इन बड़े घर के लोगों के सामने कुछ भी बोलने का अधिकार है ही कहाँ उसके पास ? जब से आई है, तब से केवल हिदायतें ही तो मिल रहीं हैं । रस्मो-रिवाज़ सीखते -सीखते पाँच साल गुज़र गए....फिर भी अम्मा जी को लगता है किवह कुछ सीख ही नहीं पाई।

क्या पहनना है, क्या बोलना है, क्या बनाना है, कैसे बनाना है, सब अम्मा जी ही तो तय करतीं हैं । उसका अपना अस्तित्व तो जैसे कुछ रह ही नहीं गया ............. । यहाँ तक कि अपना नाम भी भूल गई है .........बस "बडकी" बन के रह गई है। .......भूल गई है कि कभी कॉलेज कीबेहतरीन छात्राओं में से एक गिनी जाती थी वह । भूल गई है, कि उसके सलीके, उसके पहनावे , उसके बातचीत के तरीके और उसकी बुद्धिमत्ता के कभी लोग.............. । उसके अपने घर में उसकी सलाह महत्वपूर्ण मानी जाती थी।

लेकिन यहाँ ?? यहाँ तो उसे ख़ुद आर्श्चय होता है अपने आप पर। कैसा दब गया है उसका व्यक्तित्व! लगता जैसे नए सिरे से कोई मूर्ति गढ़ रहा है। ये वो अलका तो नहीं जिसका उदाहरण उसके शहर की अन्य माँएँ अपनी बेटियों को दिया करतीं थीं।

पाँच बरस हो गए अलका की शादी को , लेकिन आज भी नई-नवेली दुल्हन की तरह सर झुकाए सारे आदेश सर-माथे लेने पड़ते हैं। पाँच साल पहले की अलका कितनी खुशनुमा थी। एकदम ताज़ा हवा की तरह। उसकी खनकदार आवाज़ गूंजती रहती थी घर में। गुनगुनाते हुए हर काम करने की आदत थी उसकी। और इसी आदत पर बबाल हो गया यहाँ।

"घर की बड़ी बहू हो । ज़रा कायदे से रहना सीखो। क्या हर वक्त मुजरा करती रहती हो.... । "

मुज़रा !!! बाप रे!!!! सन्नाटे में आ गई थी अलका। नहीं। अब नहीं गाऊँगी। बस! तब से गुनगुनाना भी बंद।

अलका को चटख रंग कभी पसंद नहीं आते थे। एकदम हलके पर खिले खिले से रंग उसे खूब पसंद थे। ऐसे ही रंगों की बेहतरीन साडियां भी उसने खरीदीं थीं अपनी शादी के समय। तमाम रस्मों के दौरान भारी साडियां ही पहने रही थी, लेकिन तीन - चार दिन बाद थोड़ा हल्का महसूस करने के लिए अपनी पसंद की साड़ी पहनी और कमरे से बाहर आई तो अम्मा जी ने ऐसे घूरना शुरू किया जैसे पाता नहीं कितना बड़ा अपराध हो गया हो उससे। छूटते ही बोलीं-

" ये क्या मातमी कपड़े पहने हो ? हमारे यहाँ ऐसे कपड़े नई बहुएँ नहीं पहनती कोई देखे तो क्या कहे? जाओ। बदल कर आओ। अब यहाँ के हिसाब से रहना सीखो। "

तब से ले कर आज तक उन्हीं की पसंद की साडियां पहनती चली आ रही है।

सुबह की सब्जी शाम को भी खाई जाए अलका को ये बिल्कुल पसंद नहीं। फिर जिसे खाना हो खाए, अलका तो नहीं ही खायेगी। पूरे खाने का स्वाद ही ख़त्म हो जाता है जैसे .......................यहाँ अक्सर ही ऐसा होता है। सुबह दो सब्जियाँ बंबई जातीं ज़ाहिर है बच भी जायेगी। ऐसे में अपनी कटोरी में ज़रा सी सब्जी ले लेती अलका उसी में किसी प्रकार निगलती खाना.....इसी बात पर सुना एक दिन अम्मा जी कह रहीं हैं-

" इसे तो सब्जी खाने की आदत ही नहीं है। पता नहीं...... शायद मायके में सब्जी बनती ही न रही होगी इसी लिए सब्जी खाने की आदत ही नहीं है॥"

तब से रोज़ अनिच्छा से सही, बासी सब्जी खा रही है अलका....... ।

आधुनिकता का झूठा लबादा ओढे अलका की ससुराल में एलान हुआ था - ' हमारे यहाँ सब एक साथ खाना खाते हैं" अच्छा लगा था उसे। लेकिन जब खाना खाने बैठे तो बगल में बैठी अम्मा जी ने टोका-

" बडकी ज़रा पल्लू खींच लो। तुम्हारे बाल दिखाई दे रहे हैं। पल्लू माथे तक रहना चाहिए, बालों की झलक न मिले।"

मन बुझ गया था अलका का। पिता समान ससुर के सामने इतनी वर्जनाएं क्यों ? फिर अगर ऐसा ही है तो साथ में खाना खाने की ज़रूरत ही क्या है?
अलका के पति रवि सुदर्शन ; सुशिक्षित हैं लेकिन किसी बड़े नामचीन पद पर आसीन नहीं हैं। बस इसीलिए अलका भी घर में सम्मानित जगह नहीं पा सकती । छोटा देवर इंजीनियर है , साल में एक-दो बार आता है , अम्मा जी के लिए साड़ी और छिट-पुट सामान ले आता है चार दिन रहता है सो जी खोल कर खर्च करता है। इसीलिए बहुत अच्छा है। घर में उसकी इज्ज़त भी रवि से कई गुना ज़्यादा है।
इसी अभय की शादी हो रही है। बारात बस आती ही होगी। किन-किन ख्यालों ने घेर लिया था अलका को......... । सर झटक के उठ खड़ी हुई अलका।

" नानी बारात आ गई............"
"बुआ जल्दी चलो, नई दुल्हन आ गई है..........."
" अरे बडकी मामी, तुम भी चलो न!!......

तुम भी? मतलब चलो तो ठीक है नही चलो तो भी ठीक है ।
पर्दे पर तो कलाकार ही दिखते हैं ना,परदे के पीछे
उस दृश्य को तैयार करने में जुटने वाले लोग और उनकी मेहनत किसे दिखती है ? उनका तो कोई नाम भी नही जानता। ठीक यही हाल अलका का है। पूरी तैयारी उसी ने की है लेकिन कोई ये कहने वाला तक नही कि अलका ने बड़ी मेहनत की।
नई बहु का परछन हो रहा है,सास ने अपने गले की तीन तोले की चेन उतार कर बहु को पहना दी। एक -एक कर सारे रिश्तेदारों ने रस्म अदा की। बडकी के साथ भी ये ही सारी रस्में हुई थी लेकिन सास ने क्या दिया था? मुश्किल से चार ग्राम के कान के बुन्दे !!

खैर... अलका बहुत ज़्यादा नही सोचती इस बारे में । लेकिन सोचने की बात तो है न!!
" नई दुल्हन को बैठने तो दो........."

" हटो भीड़ मत लगाओ रे............"

" थोड़ा आराम कर ्लेने दो, फिर बात करना....."
किसी किसी प्रकार बच्चा पार्टी नई दुल्हन के पास से हटी।

घर में सुबह सबसे पहले उठने की जिम्मेदारी बडकी की ही है। उठकर किचन में सबके लिये चाय चढाना।
फ़िर सारे रिश्तेदारो तक पहुंचवाना भी एक बड़ा काम था। आज भी बडकी आदत के अनुसार छ्ह बजे उठकर नीचे उतर आई थी, उसने देखा, नई बहु का कमरा अभी बंद था। राहत की एक लम्बी सास ली उसने। पता नहीं क्यों उसे लग रहा था, कि यदि नई बहु उससे पहले उठ गई,तो उसे दिए जाने वाले तमाम,ताउम्र उदाहरणॊं में ये भी शामिल हो जायेगा। शादी के बाद उसे पहले ही दिन उठने में साढे छह बज गये थे, और तब से लेकर आज तक सैकडॊं बार उसे यह बात सुनाई जा चुकी है। उसकी नींद को लेकर फ़ब्ब्तियां कसी जाती रह्ती हैं। बस इसलिये नई दुल्हन का दरवाजा बंद देख उसे ऐसा लगा,जैसे कोइ बहुत बडा बोझा उसके सर से उतर गया हो।


टॆबल पर अम्मा जी और कुछ अन्य लोगों की चाय लगा दी थी बड्की ने। पौने सात बजे छोटी बहु किरन बाहर निकली। अपने नाइट गाउन के ऊपर ही दुपट्टा ओढ कर छोटी किचन में आई।

"हाय भाभी! गुड मोर्निंग। दो कप चाय मिलेगी क्या?"

बड्की ने तत्काल दो कप चाय ट्रे में रख दी। उसे लग रहा था, कि एक तो छोटी देर से उठी उस पर गाउन पहने ही बाहर चली आयी, और अब दो कप चाय लेकर वापस जा रही है। अम्मा जी से मिली भी नही, गाउन पहने है शायद इसलिये ........ ।

लेकिन ये क्या,सुना बड्की ने मगर कानों पर भरोसा नहीं हुआ। अम्मा जी भी कह रही थी छोटी से

" अरे छोटी इतनी जल्दी क्यों उठ गयी? जाओ थोडा और आराम कर लो। कोइ काम तो करना नही है---। "

हैं!! ये क्या वही अम्मा जी हैं?? अचम्भित है बड्की.... ।

न उसके बैठने पर कुछ कहा न उसके कपडो पर..... ।

अगले दो दिन फ़िर भारी व्यस्तता से भरे थे। रिसेप्शन के बाद मेहमानों की विदाई और घर व्यवस्थित करने में ही पांच दिन निकल गये। आज कुछ राहत मिली तो बड्की अपने कमरे में लेट गई। सोचा लंच में तो अभी देर है, थोडा आराम ही कर लूं। तभी जोर से खिलखिलाने की आवाज ने उसे चौका दिया-उठ कर देखा तो छोटी मेज पर खाना लगा रही थी, और चह्कते हुए पापा यानी ससुर जी को बता रही थी कि उसने क्या-क्या बनाया है। और सास जी? वो भी भाव-विभोर हो कर उसकी बातें सुन रही थी।

समझ में ही नही आया बड्की को ;क्या हो रहा है। ये दो तरह का व्यव्हार क्यों? उस पर इतनी पाबंदियां और छोटी पर??

शाम को फ़िर छोटी सास जी से जिद कर रही थी, बच्चों की तरह-

"चलिए मम्मी जी.... आइसक्रीम खाने चलेंगे........... । "

अलका की आखों में भय और अचरज का भाव देखकर तुरन्त अम्माजी बोलीं-" अरे छोटी है न...

इसलिये , अरे ओ अभय तू ही खिला ला आइसक्रीम। मैं तो न जा पाऊगीं"

रवि से कभी कहा उन्होनें, कि बड्की को आइसक्रीम खिला ला? उसे घूमना अच्छा नही लगता क्या?

और पूरे दस दिन बाद ही छोटी सूट पहनकर खडी थी, जिसे पहनने की हिम्मत अलका पांच सालों में भी नही कर पायी। और अम्मा भी
"हो गया छोटी है पहनने दो । बडॊ को शोभा नही देता सो तुम न पहनना बड्की। "

" बडो को? मैं कितनी बडी हूं, उससे केवल दो साल न?

छोटी ने तो रोज़ का रुटीन बना लिया था, घूमने का। सुबह भी कुछ बनाने का मन हुआ तो ठीक है नही तो नहीं। दोनों टाइम का खाना बड्की के सिर पर..... ।

कहीं भी जाना है तो इठलाकर पूछ्ती थी जाऊं न मम्मा??

और अम्माजी गद गद हो जाती। तुरन्त कह्ती-

" हां हां जाओ न। खाना बड्की बना लेगी। "

पता नही अम्मजी के जुबान पर किसने ताला डाल रखा था, अभय की नौकरी ने या दहेज में आये चार लाख रुपयों ने......... ।

लेकिन नही अब नहीं। अगर एक बहू के लिये अम्माजी इतनी दरियादिल और आधुनिक हो सकती हैं,तो उन्हें दूसरी के साथ भी यही रवैया अपनाना होगा। बस अब बहुत हुआ।

यदि रवि अपनी और अपनी पत्नी की स्थिती पर कुछ नही बोल सकते तो अब बड्की को ही आवाज उठानी होगी। अब कल से बड्की अपनी तरह से जियेगी। सबसे पहले उन संस्थानों में आवेदन करेगी जिन्हें उसकी ज़रूरत है।

कितना हल्का महसूस कर रही है बड्की...............

आज चैन की नींद सोयेगी अलका...... ।







शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

अलग-अलग दायरे..

"हल्लो नीरू "
'अरे !तुम आ गईं!.... आओ-आओ' मैं हाथ की झाडू वहीं छोड़ खड़ी हो गई थी, शर्म से पानी-पानी।
'तुम काम कर रहीं थीं, मैंने डिस्टर्ब कर दिया न,जल्दी आ के?'
'नहीं यार....वो तो आज इतवार है न, बस इसीलिए सफाई का काम देर तक चलता रहता है। अरे बैठो न!
राजी अपनी आदत के अनुसार धम्म से सोफे पर गिर गई,लेकिन इस धम्म के साथ ही एक जोरदार खटका भी हुआ, और मैं दरवाजे से बाहर देखने लगी। जानती थी,की राजी के ज़ोर से बैठने के कारण ,सोफे में मैंने जो अभी-अभी लकडी की तख्ती जोड़ी थी , निकल गई है।
'तुम बैठो, मैं ये कचरा निकाल के आती हूँ।'
और मैं जल्दी-जल्दी कचरा समेटने लगी। ये राजी भी तो समय से एक घंटा पहले ही आ गई है। वरना इस एक घंटे में तो मैं सफाई कर लेती, बच्चों को तैयार कर देती। अब पता नहीं कहाँ गंदे से खेल रहे होंगे!खैर अब जो होगा देखा जाएगा। हाथ धोकर मैं फिर से ड्राइंग रूम (?) में आ गई थी।
'नीरू डियर , पता नहीं तुम इतना सब कैसे कर लेती हो! मेरी तो सच्ची, बिल्कुल आदत ही नहीं है। ज़रा सा कुछ करना पड़ जाए तो बेहद थक जाती हूँ।'
'यहाँ तो मैं अकेली हूँ न, बस इसीलिए आदत सी पड़ गई है, हमारी बाई भी तो कल ही छुट्टी लेकर गई है।'
कहते-कहते हिचक सी गई थी मैं...लगा की राजी सब समझ रही है, की हमारे यहाँ बाई थी ही कहाँ !
'मम्मी-मम्मी.....देखो, मीतु ने मेरे ऊपर मिटटी डाल दी.....'
'मम्मी गीतू ने पहले डाली थी....'
गीतू-मीतु एक दूसरे की शिकायत लिए, सर से पैर तक मिटटी में नहाये हुए ड्राइंग रूम में खड़े थे। मेरे तो आंसू ही आ गए। इससे लाख दर्जे साफ -सुथरे तो रोज़ रहते हैं।
'राजी, ज़रा इनके कपड़े बदल दूँ, अभी आई। '
अन्दर आकर में बच्चों के कपड़े बदलने लगी थी।
'मम्मी, हम लोग कहीं जा रहे हैं क्या?'
'नही तो...'
'फ़िर ये नए वाले कपड़े क्यों पहना रही हो?'
उफ़!!!
सारी इज्ज़त धुलवा कर ही दम लेंगे ये बच्चे!! लेकिन वे भी क्या करें, आश्चर्य तो उन्हें होगा ही, मैं उन्हें वे कपड़े घर में पहनने ही कहाँ देती थी। जैसे-तैसे इशारे से उन्हें समझाया की चुप रहें।
ड्राइंग-रूम में आते ही राजी ने पूछा-'सुनील नहीं दिखाई दे रहे...'
'पता नहीं कहाँ निकाल गए॥'(बाज़ार गए हैं, कुछ नाश्ता लेने, मुझे अच्छी तरह पता है) ये सुनील भी तो बस! सुबह से कह रही थी की कुछ मिठाई वगैरह ले आयें.....अब इस राजी के सामने ही आयेंगे।
'तुम्हारा घर छोटा है, पर सुंदर है। तुम साफ भी तो खूब रखती हो।' 'चर्र......................''अरे क्या हुआ??''कुछ नहीं, तुम्हारे सोफे की कोई कील निकली थी शायद...साड़ी फंस गई है मेरी॥'
'रुको मैं निकाल देती हूँ...' कहती हुई मैं सोफे के पाए की कील में फँसी राजी की साड़ी निकालने के लिए झुकी। लेकिन हाय री किस्मत!!! मेरे ज़रा झुकते ही मेरी साड़ी का पल्लू लटक आया,और यत्न से छुपाई गई सीवन साफ़ दिखाई देने लगी।
ये राजी भी तो.....इतनी जल्दी आने की क्या ज़रूरत थी? साड़ी भी तो नहीं बदल पाई मैं॥
'तुम्हारी साड़ी फट गई है, लाओ मैं सिल देती हूँ....'
'अरे नहीं यार..... वैसे भी मैं इसे कई बार पहन चुकी हूँ, इसके रिटायरमेंट के दिन हैं....'
(इतनी अच्छी साड़ी... और इसका रिटायरमेंट!!)
'पापा आ गए....पापा आ गए.....'
सुनील आ गए थे,पुराना लंबा थैला साइकल पर लटकाए हुए। राजी की निगाह थैले पर ही अटकी रह गई थी। और मुझे भी सुनील नहीं थैला ही दिखाई दे रहा था। मुस्कुराते हुए सुनील थैले सहित ड्राइंग-रूम में आ गए। राजी के नमस्कार का उत्तर दे, मुझे आंखों ही आंखों में चिढाते से सुनील अन्दर चले गए। मैं तिलमिला के रह गई थी। मेरे अन्दर की हलचल मेरे चेहरे पर भी आ गई थी शायद,राजी ने पूछ ही लिया,' क्या बात है, परेशान लग रही हो?'
'अरे नहीं यार, मैं भी कैसी भुल्लकड़ हूँ, तुम्हें आए इतनी देर हो गई और मैंने पानी तक को नहीं पूछा! अभी आई'
सुनील आराम से अन्दर बैठे थे। गुस्से के मारे मैंने उनकी तरफ देखा तक नहीं, लेकिन सुनील भी कम नहीं हैं, दूसरी बार मेरे वहाँ से निकलते ही इतनी ज़ोर से चोटी खीची की ढेर सारा पानी ट्रे में गिर गया। इनका बचपना अभी तक गया नहीं। कोई गुस्सा हो भी तो कैसे? चाय बनाने अन्दर आई तो पीछे से राजी की आवाज़ आई-
'मैं अन्दर आ सकती हूँ नीरू?'
'हाँ-हाँ क्यों नहीं........'कहते-कहते मैंने एक नज़र बेड पर डाली, और अपने मम्मी-पापा को ढेर सा शुक्रियादा किया जिन्होंने ये सारा सामान मुझे दिया था,वरना सुनील की तनख्वाह में तो महीने के आखिरी दिन जैसे-तैसे ही कटते हैं...
सुनील के लाये हुए नाश्ते को प्लेट में लगा के लाई , तभी पता नहीं कहाँ से दोनों बच्चे भी प्रकट हो गए। और बेड से लग कर खड़े हो गए। अब तो कोई इशारा भी नहीं कर सकती थी मैं।
'आओ-आओ मीतू, गीतू तुम भी खाओ।'
दोनों मेरी ओर देखने लगे मेरे लेलो-ले लो कहते ही दोनों मिठाई की प्लेट पर टूट पड़े। उफ़!! कितने गंवार हैं दोनों!किसी प्रकार उन्हें बाहर भेजा तो जाते-जाते मीतू ने अपने धक्के से टेबल पर रखा पानी का गिलास ही गिरा दिया।पूरे कमरे में पानी फैल गया,और गीतू ने जाते-जाते नमकीन की प्लेट से ऐसा मुट्ठा भरा,की बेड रूम से लेकर बाहर तक नमकीन का रास्ता ही बनाती गई।
'अच्छा नीरू, अब मैं चलूँ.... आज मार्केट भी जाना है'
राजी को उसकी गाडी तक छोड़ आई थी। अबतक घटी सारी बातें सोच-सोच कर मुझे रोना आ रहा था।
'नीरू जल्दी खाना लगाओ यार, तुम्हारी सहेली ने तो भूखा मार दिया'
'आज तो हद ही कर दी तुम लोगों ने। सारी गरीबी उसे ही दिखानी थी?ये बच्चे भी बस!!नाश्ता देखते ही ऐसे टूट पड़े जैसे कभी खाने को ही न मिलता हो।'
'ठीक भी तो है नीरू। हमारे बच्चे कब-कब मिठाई खाते हैं?बच्चों को दोष देना एकदम ग़लत है। दरअसल सच तो ये है की सभी व्यक्ति अपने तबके के लोगों में ही घुल-मिल पाते हैं। मित्रता उनके बीच ही कायम रह सकती है, जिनमें बनावट नहो, दिखावा नहो। और एक दूसरे को समझने की क्षमता हो।'उपदेश देकर सुनील बाहर चले गए थे। और मैं बैठी-बैठी सोच रही थी, की अब इस बिखरे हुए घर को सहेजने में कम से कम एक घंटा तो लगेगा ही।