मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

" हवा उद्दंड है........"




( मेरे कुछ वरिष्ठ जनों के आग्रह और आदेश पर मैं अपनी इस कहानी का पुनर्प्रकाशन कर रही हूं. मेरे जिन साथियों ने इसे पूर्व में पढा है, उनसे क्षमा याचना सहित)


"अन्नू..... उठ जाओ, छह बज गए हैं।"
मम्मी की आवाज़ के साथ ही मेरी आँखें खुल गई थीं। क्या मुसीबत है! ऐसे कडाके की ठण्ड में उठना होगा! यदि इस वक्त ज़रा भी आलस किया तो 'बस ' के समय तक तैयार होना बड़ा मुश्किल होगा। बस का ख्याल आते ही एक झटके से रजाई फ़ेंक उठ खड़ी हुई थी मैं। सर्दियों में तो सचमुच ही सुबह उठना बहुत अखरता है। भइया और गिन्नी मेरी छोटी बहन को सोते देख बड़ी ईर्ष्या होती है, उनसे। भइया तो वैसे भी धुरंधर सुबक्कड़ हैं। यदि उन्हें दस बजे ऑफिस न जाना हो, तो बारह बजे तक सोते ही रहें।
जब तक मुझे नौकरी नहीं मिली थी, सोचती थी कि कितना शुभ दिन होगा, जब मुझे नौकरी मिलेगी! तब नौकरी के समानांतर चलने वाली अन्य समस्याओं पर गौर ही कहाँ किया था! उनकी जानकारी ही कहाँ थी मुझे!शुरू के दिनों में कैसे उत्साह से गई थी कॉलेज , और अब!!अब तो जाने के नाम से ही कांटे से उग आते हैं शरीर पर ।
जैसे-तैसे नाश्ता कर, बस-स्टॉप की ओर भागी थी। बस अभी आई नहीं थी। बस-स्टॉप पर एक विशालकाय इमली का पेड़ था, जिसकी छाया में हम रोज़ अप-डाउन वाले बस का इंतज़ार किया करते थे। लेकिन मुझे वहां खड़ा होना बड़ा अजीब लगता था। मेरा पूरा वक्त घड़ी देखते या फिर अपने बैग को दोनों हाथों में बारी-बारी से बदलते बीतता।

मुझे स्टॉप पर पहुंचे अभी दो मिनट ही हुए होंगे, की एक लड़का बड़ी तेज़ साइकलिंग करता हुआ मेरे बहुत करीब से गुज़र गया ; इतने करीब से कि मैं चौंक कर दो कदम पीछे हट गई। यदि मैं पीछे न हटती तो निश्चित रूप से वह साइकिल मुझ से टकरा जाती। मेरे इस तरह पीछे हटने पर , थोडी ही दूरी पर खड़े तीन-चार लड़के हो-हो कर हंसने लगे। क्रोध और विवशता से बस होंठ भींच कर रह गई मैं।

आजकल के किशोरवय प्राप्त लडके इतने असभ्य और उद्दंड हो गए हैं कि इनके लिए कुछ कहने को मेरे पास तो शब्द ही नहीं हैं.लगता है, आजकल की हवा ही उद्दंड हो गई है। जिस लड़के को छूती है, उसी के पर निकल आते हैं।
बस आ गई थी। भीड़ का रेला बस की ओर दौड़ पड़ा था। इस रेलमपेल में दबी हुई मैं भी किसी तरह बस में चढ़ने में सफल हो गई थी। सारी सीट्स भर चुकीं थीं । खड़े रहने के सिवा कोई चारा न था। आगे एक प्रौढ़ सज्जन खड़े थे, सो उसी जगह को उपयुक्त समझ कर मैंने भी अपने लिए वहीं जगह बना ली थी। एक झटके के साथ बस चल पड़ी थी। इस बस का टाइम ऐसा था की साइंस कॉलेज वाले अधिकतर लड़के-लड़कियां इसी बस से जाते थे। ड्राइवर जब ब्रेक लगाता तो कुछ इस तरह कि बस को जोरदार झटका लगता , जिससे बस में खड़ा प्रत्येक व्यक्ति असंतुलन की अवस्था में आ जाता और इस समय पीछे खड़े लड़के मौके का फायदा उठाते हुए लड़कियों को अपने हाथ का सहारा दे लेते, जबकि आगे खड़े लड़कों पर लड़कियां ख़ुद ही जा गिरतीं। ड्राइवर को झटकेदार ब्रेक की ताकीद लड़कों की ही थी।

अचानक ही बस की रेलिंग पर कसे हुए अपने हाथ के ऊपर किसी दूसरे हाथ का स्पर्श पा मैंने देखा , तो उन्हीं प्रौढ़ सज्जन का हाथ था। वे पीछे खड़े किसी व्यक्ति से बातें कर रहे थे। उनका सर पीछे की ओर घूमा हुआ था। अनजाने में ही उनका हाथ आ गया होगा ऐसा सोचकर मैंने अहिस्ता से अपने हाथ को ज़रा आगे खिसका लिया था। लेकिन दो मिनट बाद ही उसी हाथ का स्पर्श मैंने फिर महसूस किया। पलट करब देखा ,तो वे सज्जन पूर्ववत बातें करने में मशगूल थे। हाथ हटाना चाहा तो उनके हाथ की पकड मजबूत हो गई, मेरे हाथ पर। घबरा के फिर उनकी ओर देखा तो उन्हें अपनी ओर घूरता पाया। एक जोरदार झटके के साथ मैंने अपना हाथ रेलिंग पर से हटा लिया, ये जानते हुए की हाथ हटाने से मैं ख़ुद असंतुलित हो जाउंगी। मैं उन तथाकथित 'सज्जन ' से कुछ भी कह कर बस में ख़ुद आकर्षण का केन्द्र नहीं बनना चाहती थी।
लड़कियों की यही तो त्रासदी है की लोग उन्हीं से छेड़खानी करते हैं और फिर यदि इसे वे ज़ाहिर करती हैं तो लोग उन्हें ऐसी नज़रों से देखते हैं, जिन्हें झेल पाना बड़ा मुश्किल होता है।

लेकिन इस व्यक्ति की हरकत पर मैं अचम्भित थी। कम से कम पचास वर्ष की उम्र तो होगी ही उनकी। फिर क्या किशोरवय के लिए की गई मेरी विवेचना ग़लत हो गई? किशोर होते लड़कों को तो उनका अपनी उम्र से होता नया-नया परिचय उद्दंड बना देता है, लेकिन इनके लिए क्या कहूं? ये तो वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हैं!इस प्रकार क्या ये कभी अपनी मेरी ही उम्र की बेटी को कहीं अकेली भेज पायेंगे? क्या ये अपनी उम्र के लोगों पर विश्वास कर पायेंगे? ऐसे 'सज्जनों' की हमारे यहाँ कमी नहीं है , जो लड़कियों के आत्मबल का शमन करते हैं।

मैं अपने कॉलेज की अनुशासन-प्रिय व्याख्याता,बस की भीड़ में इतनी निरीह, दब्बू हो जाती हूँ कि बस के बाहर आकर समझ ही नहीं पाती की मैं इस तरह दोहरा व्यक्तित्व कैसे वहन करती हूँ। शायद उम्र पाने के बाद अपनी इस असहायावस्था से मुक्त हो सकूं।

उन 'सज्जन 'की हरकतों में कमी नही आई थी। वे निरंतर अपने कंधे का स्पर्श मेरे कंधे को दे रहे थे । और उन्हें एक झन्नाटेदार थप्पड मारने की मेरी इच्छा भी बलवती हो उठी थी। बस में भीड इतनी थी कि आगे भी नहीं जा सकती थी। तभी ज़रा आगे एक सीट खाली हुई, और वहां बैठी महिला ने मुझे बुला लिया। शुक्र है भगवान का, वरना थोडी ही देर में मै उस व्यक्ति को एक थप्पड रसीद कर ही देती। मेरा स्टॉप आ गया था। बड़ी राहत महसूस की थी मैंने।

बस के रुकते ही मैं अपने बैग को सम्हालती दरवाज़े की ओर बढी थी । आगे बैठे लडकों की नज़रें मैं अपने चेहरे पर स्पष्ट महसूस कर रहे थी. सिर नीचा किये मैं तेज़ी से नीचे उतर गई. दो कदम आगे बढने पर ही मुझे सुनाई दिया, कोई गा रहा था-
" उमर है सतरह साल इतनी लम्बी चोटी है...."
और मुझे खयाल आया कि आज देर हो जाने की वजह से मैने अपने लम्बे बालों की चोटी को नीचे से खुला ही छोड दिया था. मेरे हाथ यन्त्रवत चोटी लपेटने को उठे लेकिन नहीं अब और नहीं.... अब इस समय मैने उसे यों ही लहराने दिया, उद्दंड हवा के विरोध में.

रविवार, 4 अप्रैल 2010

मेरी पसंद....







हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।



मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।



जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।



जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।



लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।



जब मुसीबत पड़े, और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।



० कन्हैयालाल नंदन

मेरी पसंद....

मेरे हमराह मेरा साया है
और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ


मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ

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आंधी से टूट जाने का खतरा नजर में था
सारे दरख्त झुकने को तैयार हो गए


तालीम, जहन, ज़ौक, शराफत, अदब, हुनर
दौलत के सामने सभी बेकार हो गए


फिर यूँ हुआ कि सबने उठा ली क़सम यहाँ
फिर यूँ हुआ कि लोग ज़बानों से कट गए

सर्वत एम. जमाल
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जिसे सब ढूंढ़ते फिरते हैं मंदिर और मस्जिद में
हवाओं में उसे हरदम मैं अपने साथ पाता हूं


फसादों से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसले
हटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल बिछाता हूं

* * * * * * * * * * * *

ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं


देने वाला घर बैठे भी देता है
दर दर हाथों को फैलाना, ठीक नहीं

नीरज गोस्वामी
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कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।

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न तो मेरे ख़त का उत्‍तर, न शिकायत, न गिला,
क्‍या हमारे बीच में रिश्‍ता बचा कुछ भी नहीं।

सुब्‍ह से विद्वान कुछ, सर जोड़ कर बैठे हैं पर,
मैनें पूछा तो वो बोले मस्‍अला कुछ भी नहीं ।

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एक कपड़ा मिल गया तो खुश ये बच्‍चे हो गये,
इनके कद से भी बड़ी इनकी कमीज़ें देखिये।

तिलकराज कपूर.
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मुश्किलों में कोशिशें मत छोड़िये कुछ कीजिये
इन ही तदबीरों से बदलेगा मुकद्दर देखना

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हां, मैं तुझसे हूं, मगर मेरा भी है अपना वजूद
पत्ते गिर जायेंगे तो, साया कहां रह जाएगा

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सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

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संदेश इनके प्यार का किसने चुरा लिया,
अंदेशा लेके आते हैं त्यौहार किसलिए ?

जब इसका इल्म था कि ये धोया न जायेगा,
मैला किया था आपने किरदार किसलिए ?

शाहिद मिर्ज़ा"शाहिद"
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गर प्यार न हो तो, ये जहां है भी नहीं भी
होंगे न मकीं गर,तो मकां है भी नहीं भी

लब बंद हैं ,दम घुटता है सीने में ’शेफ़ा’ का
हक़ कहने को इस मुंह में ज़बां है भी नहीं भी

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जो किसी के काम ही आए नहीं
हैफ़ ऐसी ज़िंदगी बेकार है,

भूल जाए गर ’शेफ़ा’ एख़्लाक़ियात
फिर तो तेरी ज़हनियत बीमार है

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मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में

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उलझ न जाए कहीं दोस्त आज़माइश में
कि ख़्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना

इस्मत जैदी "शेफा कजगांववी"
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उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

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कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

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अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया

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गर इजाज़त दे ज़माना, तो मैं जी लूँ इक ख़्वाब
बेड़ियाँ तोड़ के आवारा हवा हो जाऊँ
श्रद्धा जैन
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जिसकी जड़ें ज़मीन में गहरी उतर गईं
आँधी में ऐसा पेड़ उखड़ता नहीं कभी

मुझसा मुझे भी चाहिए सूरज ने ये कहा
साया मेरा ज़मीन पे पड़ता नहीं कभी

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बुझा रही है चराग़ों को वक़्त से पहले
न जाने किसके इशारों पे चल रही है हवा

गोविन्द गुलशन
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सौदा हुआ तो क्या हुआ दो कौड़ियों के दाम
सस्ता न इतना ख़ुद को बना दें तो ठीक है

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फुरसत मिले तो इनको ज़रा पढ़ भी लीजिए !
कुरान, बाईबल और गीता हैं बेटियां !!

नन्ही कली ओ बादे-सबा 'दर्द' की गज़ल !
क्या-क्या बताऊं आपको क्या-क्या हैं बेटियां !!
दर्द शुजालपुरी
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शनिवार, 20 मार्च 2010

नहीं चाहिये आदि को कुछ....


"ये क्या है मौली दीदी?"
" आई-पॉड है."
"ये क्या होता है?"
" अरे!!!! आई-पॉड नहीं जानते? बुद्धू हो क्या?"
इतना सा मुंह निकल आया आदि का. क्या सच्ची बुद्धू है आदि ? क्लास में तो अच्छे नंबर पाता है.....हाँ, कुछ चीज़ों के उसने नाम सुने हैं, लेकिन देखा नहीं है.
"अरे पागल, ये आई-पॉड है, इसमें बहुत सारे गाने भरे हैं. पांच सौ से ज्यादा गाने डाउन-लोड कर सकती हूँ मैं इसमें. और हाँ ये एम्.पी. फ़ोर है."
" इत्ते सारे गाने? इसमें??? ..............वैसे मौली दी, ये एम्. पी. फ़ोर क्या है......?"
पूछते हुए अपने आप में सिमट गया था आदि, पता नहीं अब कौन से विशेषण से नवाज़ा जाएगा उसे..........
" अरे इधर आओ बसंतकुमार, मैं तुम्हें समझाती हूँ. "
आदि झिझकते-सकुचाते मौली के पास बैठ गया.
" ये देख , स्क्रीन दिखता है इसमें?"
"............................"
" दिखता है या नहीं?"
' दिखता तो है"
' तो जब हम कोई वीडियो क्लिप इसमें डाउन-लोड करेंगे तो वो हमें इसी स्क्रीन पर दिखाई देगी. समझा कुछ?"
" हां...समझा तो...."
" और गाने सुनने के लिए वही, ईयरफोन"
" ये कितने का आता है मौली दी?"
" मंहगा नहीं है यार, बस टू थाऊजंड का है."
" टू थाऊजंड..........यानि सौ के कितने नोट मौली दी..?"
सात साल का आदि , मुश्किल में पड़ गया था.........
" अरे बुद्धू, हंड्रेड के ट्वेंटी नोट यानि सौ-सौ के बीस नोट."
" सौ -सौ के बीस नोट.................... तब तो बहुत सारे रूपये चाहिए....."
" अब इतने सारे भी नहीं हैं ये. अपने पापा से कहना, तो वे ला देंगे तुम्हारे लिए."
बारह साल की मौली ने अपना ज्ञान बघारा.
आदि, यानि पांडे जी का छोटा बेटा, जब भी मौली के घर जाता है, चमत्कृत होता है. कितना बड़ा घर, कितना सारा सामान..... सबके अलग-अलग कमरे..
कितने सारे सामानों के तो नाम ही नहीं जानता आदि.... वो तो मौली दी बहुत अच्छी हैं, सब सामानों के बारे में बताती हैं.
आदि हमेशा सोचता है, उसका घर मौली के घर जैसा क्यों नहीं है? हम लोग किराए के घर में क्यों रहते हैं? मौली दी कोई फरमाइश करें, तो उनके मम्मी-पापा तुरंत पूरी करते हैं, मेरी फरमाइशें क्यों पूरी नहीं होतीं? जब भी कुछ मांगो तो फट से सुन लो " हमारे पास पैसों का पेड़ नहीं है, जो तोड़-तोड़ के तुम्हारी ऊटपटांग मांगें पूरी करते रहें."
मौली दी के बगीचे में पैसों का पेड़ लगा है क्या?
ज़रूर लगा होगा ! उसी से तोड़-तोड़ के सामान खरीदते होंगे.
आदि को मौली के घर में रहना बहुत अच्छा लगता है. सब एक दूसरे से कितने प्यार से बातें करते हैं. आदि भी पूरे घर में कहीं भी आ-जा सकता है. कोई मनाही नहीं. उसके घर में तो जब देखो तब चख-चख . मम्मी कुछ घरीद लें, तो पापा घर सिर पे उठा लेते हैं. कितना चिल्लाते हैं! दिन रात खटने की दुहाई देते हैं. हर बात में कह देते हैं, पैसा नहीं है....
पता नहीं , पैसों का पेड़ क्यों नहीं लगा लेते.....पौधा तो मौली दी के घर से मिल ही जाएगा. शायद कलम लगती हो.........
पूछेगा आदि मौली से.
मौली दी के पापा कितने अच्छे हैं. कितनी बड़ी बड़ी चॉकलेट लाते हैं उनके लिए. आदि को सब चॉकलेटों के नाम और स्वाद मालूम हैं. मौली दी उसे भी खिलाती हैं न! चॉकलेट खाने के बाद जब मौली दी उसका रैपर फ़ेंक देतीं हैं , तो आदि चुपचाप उसे उठा लेता है, एकदम नज़र बचा के. पूरा डिटेल पढ़ता है. बार-बार सूंघता है रैपर को ...और फिर सहेज के रख लेता है.
आदि के पापा तो कभी चॉकलेट खरीदते ही नहीं. कभी-कभार टॉफी ला देते हैं, तो वो भी बस दो-दो ही मिलतीं हैं दोनों भाइयों को. और मांगो तो डपट देते हैं कि " दाँत खराब करना हैं क्या?"
मौली दी के दाँत तो एकदम सफ़ेद हैं.....................
मौली दी के पापा गाड़ी से ऑफिस जाते हैं. एकदम चमाचम गाड़ी. सुबह सबसे पहले उनका नौकर गाड़ी ही साफ़ करता है. मौली दी का नौकर उनकी गाड़ी, और उसके पापा अपनी साइकिल लगभग एक ही समय पर साफ़ करते हैं.
अच्छा नहीं लगता आदि को......................
उसके पापा गाड़ी क्यों नहीं खरीदते? पूछा था आदि ने पापा से, लेकिन उन्होंने हंसी में उड़ा दिया.....आदि समझ ही नहीं पाता पापा की बातें.
लेकिन आदि को मौली दी की तरह रहना अच्छा लगता है. उसके दोनों दोस्त , रोहन और अनवर भी तो मौली दी की तरह ही रहते हैं. पैरेंट्स-मीटिंग में उनके पापा भी तो गाडी से ही आते हैं. लेकिन आदि के पापा....................
पिछली बार साइकिल के डंडे पर बैठा आदि कितना शर्मिंदा हो गया था , जब रोहन की गाडी ठीक उसकी बगल में आकर खड़ी हो गई थी.
अब तो आदि भी कई बार झूठ बोल देता है............. सब बड़ी-बड़ी बातें हैं.....अगर वो झूठ न बोले और बता दे कि उसका कोई कमरा नहीं , वो तो रात को बाबा आदम के ज़माने के , तांत की बुनाई वाले सोफे पर सोता है, तो कौन उससे दोस्ती करेगा? भला हो मौली दी का , जिनके कारण न केवल उसे हर आधुनिकतम सामान देखने को मिलता है, बल्कि उनका इस्तेमाल भी जानता है. इसीलिये अपने दोस्तों के बीच किसी भी सामान के बारे में ऐसे बताता है , जैसे वो मौली का नहीं, उसका खुद का हो.
काश! उसने मौली के घर जन्म लिया होता!
अपने घर में वो जब भी आसनी बिछा के खाना खाने बैठता है तो उसे मौली दी की डाइनिंग टेबल खूब-खूब याद आने लगती है. चमकती हुई...शीशे की.....उस पर क्रॉकरी....
कितनी नफ़ासत से सब थोडा-थोडा खाना निकालते हैं प्लेट में...
उसके पापा तो जब खाना खाने बैठते हैं , तो मम्मी रोटियों कि पूरी गड्डी ही रख देतीं हैं थाली में. सब्जी भी ऊपर तक भर देतीं हैं कटोरी में. मौली दी के यहाँ खाते समय कोई आवाजें नहीं करता, और आदि के यहाँ?
पापा तो इतनी आवाजें करते हैं न, कि दूसरे कमरे में बैठा आदि बता सकता है, कि वे कब क्या खा रहे हैं. चाय भी ऐसे सुड़क-सुड़क के पीते हैं, कि आदि सोते से जाग जाता है.
पहले आदि को पापा की सारी आदतें बहुत अच्छी लगतीं थीं. वो भी चाय सुड़कने लगा था. लेकिन मौली दी की मम्मी ने समझाया , उसने चाय सुडकना बंद कर दिया.
समझाया तो उन्होंने ये भी था कि बच्चे चाय नहीं पीते, तुम दूध पिया करो.
उसने मम्मी से कहा भी था कि वे उसे दूध दिया करें. लेकिन मम्मी ने कहा कि अभी कुछ दिन चाय पियो, फिर अगले महीने से दूध बढ़ा लेंगीं. लेकिन वो अगला महीना आया ही नहीं......
उसकी कोई भी बात मम्मी पूरी नहीं करतीं. पिछली बार अपने जन्मदिन पर आदि ने कहा था कि उसे भी मौली दी की तरह केक काटना है. मौली दी से कन्फेक्शनरी का पता भी ले आया था. पापा गए भी थे दुकान तक, लेकिन फिर बिना केक के लौट आये . बोले- बहुत मंहगे है. मम्मी झट से बोलीं- मैं घर में बना दूँगी. आदि खुश.
लेकिन मम्मी ने क्या किया? हलवा बना के उसी को केक के आकार में जमा दिया!
कितनी अच्छी हैं मौली दी की मम्मी.....एक उसकी मम्मी हैं...दिन भर काम करतीं हैं, और अपनी ही साडी से हाथ पोंछतीं रहतीं हैं. कभी आदि को डांटती हैं कभी भैया को.
काश! मौली दी कि मम्मी उसकी मम्मी होतीं.................
सुबह देर से आँख खुली थी आदि की. किसी ने जगाया ही नहीं. जब उठा तो घर कितना सूना-सूना लग रहा था. न मम्मी कि आवाजें न पापा कीं. कहाँ गए ये लोग?
अन्दर से बाहर तक ढूंढ लिया मम्मी को, नहीं मिलीं. केवल भैया बाहर बैठा था. उसी ने बताया कि बड़े सबेरे मम्मी कि तबिअत अचानक ही ख़राब हो गई, तो पापा उन्हें हॉस्पिटल ले गए हैं. और ये भी कि दस बजे जब भैया स्कूल जाएगा तब आदि को मौली के घर छोड़ देगा, पूरे दिन के लिए.
मौली दी के घर! पूरे दिन!! बांछें खिल गईं आदि कीं. मम्मी बीमार हैं, ये भी भूल गया. फटाफट नहा-धोकर तैयार हो गया.
मौली दी भी उस समय स्कूल में थीं, जब आदि उनके घर पहुंचा. आंटी ने उसे ढेर सारी स्टोरी बुक्स दे दीं.
लेकिन कितनी देर पढता आदि? थोड़ी देर में ही बोर होने लगा. तभी आंटी ने उसे ब्रेक-फास्ट के लिए बुलाया . आदि प्रसन्न. टेबल पर आंटी, अंकल और आदि. आंटी ने टोस्ट पर बटर लगाया, प्लेट उसकी ओर खिसकाई.
गपागप खा गया आदि. और की इच्छा थी, लेकिन मांगे कैसे? सब दो पीस ही खा रहे थे. उसका घर होता तो मम्मी पहले ही चार ब्रेड देतीं.
फिर लंच के समय भी............
उसका मन हो रहा था कि कुर्सी पर ही आलथी-पालथी लगा के बैठ जाए लेकिन............
मन हो रहा था कि चम्मच फेंक के , पूरी कटोरी की दाल चावल में उड़ेल के, हाथ से खा ले, जल्दी-जल्दी लेकिन..................
बहुत बंधा-बंधा सा महसूस कर रहा था आदि................मम्मी की याद आ रही थी. पता नहीं उन्हें क्या हो गया? अपने घर की भी बहुत याद आ रही थी. शाम होते-होते उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था, न कम्प्यूटर, न वीडियो गेम न और कुछ......................
" आदि आओ बेटा....." पापा की आवाज़ सुन उछाल पड़ा आदि, जैसे बरसों बाद सुनी हो ये आवाज़. लगा कितने दिन हो गए, घर छोड़े...............
दौड़ता हुआ बाहर आया. मौली दी को बाय तक कहना भूल गया.........
घर पहुँच के मम्मी से लिपट गया आदि. कितना सुकून......................कितना सुख. न नहीं चाहिए उसे मौली का घर, मौली की मम्मी.
भैया चाय बना लाया था. पापा अपने चिर-परिचित अंदाज़ में सुडकने लगे. आदि मुस्कुराया. अपना कप उठाया, प्लेट में चाय डाली, और खूब जोर से सुड़क गया.

चित्र: गूगल सर्च से साभार.

सोमवार, 8 मार्च 2010

मेरी पसंद....

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,


आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है.



ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,


यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है.



एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,


इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है.



मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,


तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है.



इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके,


जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है.



कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,


मैंने पूछा नाम तो बोला की हिदुस्तान है.



मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,


हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है.



दुष्यंत कुमार


अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष पर शुभकामनाएं.

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

बातों वाली गली

बातों वाली गली
सामने वाले घर में सामान उतरता देख अचानक ही सोया पड़ा मोहल्ला जाग सा गया. चहल-पहल बढ़ गई. हर घर के दरवाज़े से एक अदद सिर थोड़ी-थोड़ी देर में बाहर निकलता, सामने वाले घर कि टोह लेता और फिर अन्दर हो जाता.

दोपहर तक सारा सामान उतर चुका था और सामने वाले घर के दरवाज़े भी बंद हो गए थे. कोई खास खबर न मिल पाने के कारण पड़ोस कि खोजी महिलाएं खासा दुखी और परेशान दिखाई दे रही थीं. शाम के इंतज़ार में इन महिलाओं ने अपनी दोपहर की नींद भी खराब कर ली.


अनु जिस मोहल्ले में रहती है, वो शहर का सबसे पुराना मोहल्ला है, जहाँ घर आज की नई कॉलोनियों की तरह व्यवस्थित नहीं हैं. उसके घर के बगल से जो गली अन्दर की ओर जाती है, वहीँ रहतीं हैं मिसेज गुप्ता, यानि गुप्ताइन, यानि पूरे मोहल्ले का चलता-फिरता रेडियो. हर घर की खबर उनके पास. कब, कहाँ, क्या हुआ क्यों हुआ, झगडा, प्रेम सब. सब जानती हैं वे.


शाम चार बजे से मिसेज गुप्ता के दरवाज़े पर पड़ोस की बतरस प्रेमी महिलाओं की पंचायत शुरू होती जो शाम साढे छह के बाद ही ख़त्म होती, सबके पतियों के ऑफिस से लौटने के बाद. हर महिला के हाथ में कोई न कोई काम होता, लेकिन ये काम एक रत्ती आगे न बढ़ता. बढ़तीं तो केवल बातें. एक बात में से दस बातें निकलतीं. बात का रूप ही बदल जाता.


अनु बहुत डरती है इस पंचायत से. असल में न तो उसका स्वभाव मेल खाता है इन महिलाओं से, और न ही उसके पास समय है. वैसे समय होता तब भी उस सभा में तो नहीं ही जाती अनु.


शुरू में जब अनु इस मोहल्ले में आई थी, तब सारी महिलाएं मिलने आईं थीं. उसे लगा कि कितना अच्छा मोहल्ला है. लेकिन जल्द ही उसकी गलतफहमी दूर हो गई, जब ये महिलाएं रोज़ आकर उसके लॉन में बैठक जमाने लगीं. नई थी, एकदम से कुछ कह भी नहीं सकती थी. इन महिलाओं का जैसे ही निंदागान शुरू होता, अनु को कोफ़्त होने लगती. क्यों नहीं इन्हें यहाँ आने से रोक देती?
>
बातों वाली गली
पहले दिन ही मिसेज़ शर्मा ने बड़े ठसके से ऐलान किया था-
"पहले यहाँ सिंह साब रहते थे, और तब से हमारी बैठक का अड्डा यही है, सो अच्छा हुआ कि आप इतने अच्छे स्वभाव की निकलीं. हमारा अड्डा बना रहेगा."


कब तक बर्दाश्त करती अनु? कुछ दिनों बाद ही उसने इस बैठक को उपेक्षित करना शुरू कर दिया. कोई न कोई बहाना बना, बैठक से गायब हो जाती. धीरे-धीरे उसकी बेरुखी रंग लाने लगी. महीने भर बाद ही बैठक स्थल परिवर्तित हो गया., तो अनु ने चैन की सांस ली.
ये अलग बात है कि इस पूरे प्रकरण के बाद अनु को घमंडी और नकचढ़ी टाइप के विशेषणों से सम्मानित होना पड़ा.


इस शहर की मिडिल क्लास मानसिकता से अनु को बहुत कोफ़्त होती है. पडोसी न हुए, सीसीटीवी कैमरे हो गए. हर बात पर नज़र.............
सुनील के ऑफिस से लौटने के बाद शाम सात बजे अनु और सुनील घूमने जाते थे. इधर दोनों अपने गेट से निकले, और उधर तमाम आँखें सक्रिय हो गईं. लम्बे समय से महिला मंडली में चर्चा का विषय अनु ही थी.

"आदमी ऑफिस से आया नहीं की निकल पड़ी घूमने. बेचारा बड़ा सीधा लगता है...."
" हुंह.....सीधा.....खुद ही ले जाता है..."
" देखो तो कैसी सज-धज के निकलती है. अरे हम भी कभी इनकी उम्र के थे, लेकिन क्या मजाल सबके सामने इनसे बात भी कर लें! घूमना तो बहुत दूर की बात है."
फिर मंडली की ही कोई महिला ये बातें अनु को बता जाती.
कोई आया नहीं कि पड़ोसनें टोह लेने लगतीं. कौन है? कहाँ से आया है? क्यों आया है?
बहुत कोफ़्त होती है अनु को.................


लेकिन जब से सामने वाले घर में नए किरायेदार आये हैं , अनु बहुत राहत महसूस कर रही है. कारण, मोहल्ले की सारी महिलाओं का ध्यान उस पर से हट कर नए किरायेदार की टोह लेने में लग गया था.
इधर कई दिनों से नए किरायेदार के घर नियमित रूप से अलस्सुबह या फिर देर रात आने वाली काली गाडी पड़ोस में चर्चा का विषय बनी हुई थी. महिला-मंडल परेशान था. कई महिलाएं गाडी के समय पर मुंह अँधेरे जागने लगीं , तो कई देर रात तक . नतीजतन, उन्होंने इस खबर को पुख्ता किया की देर-सबेर आने वाली ये गाडी, सामने वाली किरायेदारिन को लेने आती है. अब तो क्या कहने!!!
मोहल्ले में एक बार फिर रौनक छा गई. महिलाओं के टोही दस्ते अपने काम पर जुट गए.


सामने वाला घर चूंकि अनु के एकदम सामने था, सो औपचारिकतावश अनु ने नए पडोसी को अपने घर खाने पर आमंत्रित किया था. तभी उसे मालूम हुआ था की शचि, यानि नई किरायेदारिन, रेडियो में उदघोषिका के पद पर कार्यरत हैं, रेडियो कॉलोनी में घर न मिलने की वजह से यहाँ घर लेना पड़ा. और ये भी कि उन्हें शिफ्ट ड्यूटी करनी होती है, सुबह की ड्यूटी होती है तो साढे पांच बजे लेने , और शाम की शिफ्ट होती है तो रात साढे ग्यारह बजे छोड़ने आकाशवाणी की गाडी आती है. उस दिन खूब बातें हुईं अनु और शचि कीं.
पड़ोस की महिलाओं ने बहुत कोशिश की शचि के घर में घुसने की, लेकिन उसकी व्यस्त और अनियमित दिनचर्या के चलते सफल न हो सकीं.


सुबह सब्जी वाले की आवाज़ सुन के अनु बाहर आई तो देखा गली की दो-तीन महिलाएं पहले से ही वहां मोल-भाव कर रहीं थीं. अनु को देख आपस में खुसुर-फुसुर करने लगीं.
बहुत कोफ़्त होती है अनु को ऐसी खुसुर-फुसुर से...........
सब्जी लेकर लौटने लगी तो मिसेज़ गुप्ता ने आवाज़ दी-
" अरे डिंकू की मम्मी, वो सामने वाली शर्माइन तो दिखाई ही नहीं देतीं, कहाँ रहती हैं, आपको तो मालूम होगा.." कहते-कहते उनके चेहरे पर कुटिल मुस्कान तैर गई.
" नहीं मुझे नहीं मालूम." कह के अनु ने पीछा छुड़ाना चाहा, जाने को हुई तो उसे आवाज़ आई-
" अरे दिखे कहाँ से बेचारी!!! अपने यार-दोस्तों से फुरसत मिले तब न....जब देखो तब गाडी हाजिर..न सुबह देखे न शाम.....पता नहीं कहाँ से आ गए ये लोग मोहल्ला गन्दा करने...."
क्या!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
उफ्फफ्फ्फ़ !!!!!!!!!!!!


क्या कह रही हैं ये!!!!
किसी के बारे में कोई भी राय क़ायम कर लेंगीं? और सच्चाई की मोहर भी लगा देंगीं? हे ईश्वर!!! इन मंदमति महिलाओं ने तो ये दुष्प्रचार पूरे मोहल्ले में कर दिया होगा! एक अच्छी भली महिला के चरित्र पर कैसे कीचड उछाला जाता है, देख रही थी अनु......
क्या करे अब अनु??
बड़ी मुश्किल से दिन गुज़रा था उसका . शाम होते ही चल पड़ी थी अनु महिला-मंडल के अड्डे पर.
सारी महिलाऐं पशोपेश में........आज ये लाट साहिबा यहाँ कैसे?? का भाव लिए, प्रश्नवाचक नज़रों से देखती हुईं...


अनु ने उन्हें बहुत देर तक असमंजस में नहीं रहने दिया. सधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया उसने-" मैं आज बहुत ज़रूरी बात कहने और एक आग्रह करने आई हूँ. हमारी नई पड़ोसन के बारे में आप सबने जो राय क़ायम की है, जिन अफवाहों को फैलाया है, प्लीज़ अब उन्हें ख़त्म करने का काम भी करें, क्योंकि आप में से कोई भी नहीं जानता कि कभी सुबह, कभी दोपहर तो कभी रात में जो आवाज़ रेडियो के माध्यम से आपके घरों में गूंजती है , और जिन शचि दीदी के फरमाइशी कार्यक्रम की मिसेज़ सिंह दीवानी हैं, ये वही शचि हैं.
रेडियो की ड्यूटी के कारण आप उन्हें देर-सबेर आते-जाते देखते हैं. और हाँ वो संदिग्ध गाडी आकाशवाणी की गाडी है जो उन्हें लेने आती है. सो प्लीज़......."
हांफने लगी थी अनु.


और सामने बैठा महिलाओं का हुजूम हतप्रभ था, नि:शब्द भी.

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

मेरी पसंद....

लीक पर वे चलें.....
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Sarveshwar Dayal Saxena

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने,
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना